hasti apni habab ki si hai ye numaish sarab ki si hai my life is like a bubble now mirage-like appears this show nazuki us ke lab ki kya kahiye pankhudi ik gulab ki si hai the softness of her lips is close to velvet petals of a rose chashm-e-dil khol is bhi aalam par yaan ki auqat khvab ki si hai do let your heart's eye see this world tis but a dreamlike state unfurled baar baar us ke dar pe jaata huun halat ab iztirab ki si hai repeatedly to her address i go, lo, such is my distress nuqta-e-khal se tira abru bait ik intikhab ki si hai your brow inscribed upon your skin a line of poetry akin main jo bola kaha ki ye avaz usi khana-kharab ki si hai when i spoke out, she did complain "that derelict is here again" atish-e-ghham men dil bhuna shayad der se bu kabab ki si hai this heart long burnt in sorrow's hell there is a barbecue like smell dekhiye abr ki tarah ab ke meri chashm-e-pur-ab ki si hai just as a monsoon cloud appears these eyes of mine are full of tears 'mir' un nim-baz ankhon men saari masti sharab ki si hai miir in her half-ope eyes there is the fullness of wine's heady bliss hasti apni habab ki si hai ye numaish sarab ki si hai my life is like a bubble now mirage-like appears this show nazuki us ke lab ki kya kahiye pankhudi ek gulab ki si hai the softness of her lips is close to velvet petals of a rose chashm-e-dil khol is bhi aalam par yan ki auqat khwab ki si hai do let your heart's eye see this world tis but a dreamlike state unfurled bar bar us ke dar pe jata hun haalat ab iztirab ki si hai repeatedly to her address i go, lo, such is my distress nuqta-e-khal se tera abru bait ek intikhab ki si hai your brow inscribed upon your skin a line of poetry akin main jo bola kaha ki ye aawaz usi khana-kharab ki si hai when i spoke out, she did complain "that derelict is here again" aatish-e-gham mein dil bhuna shayad der se bu kabab ki si hai this heart long burnt in sorrow's hell there is a barbecue like smell dekhiye abr ki tarah ab ke meri chashm-e-pur-ab ki si hai just as a monsoon cloud appears these eyes of mine are full of tears 'mir' un nim-baz aankhon mein sari masti sharab ki si hai miir in her half-ope eyes there is the fullness of wine's heady bliss
Related Ghazal
वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
244 likes
ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
232 likes
कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
435 likes
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
130 likes
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
107 likes
More from Meer Taqi Meer
जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है रूमाल दो दो दिन तक जूँ अब्र तर रहे है आह-ए-सहर की मेरी बर्छी के वसवसे से ख़ुर्शीद के मुँह ऊपर अक्सर सिपर रहे है आगह तो रहिए उस की तर्ज़-ए-रह-ओ-रविश से आने में उस के लेकिन किस को ख़बर रहे है उन रोज़ों इतनी ग़फ़लत अच्छी नहीं इधर से अब इज़्तिराब हम को दो दो पहर रहे है आब-ए-हयात की सी सारी रविश है उस की पर जब वो उठ चले है एक आध मर रहे है तलवार अब लगा है बे-डोल पास रखने ख़ून आज कल किसू का वो शोख़ कर रहे है दर से कभू जो आते देखा है मैं ने उस को तब से उधर ही अक्सर मेरी नज़र रहे है आख़िर कहाँ तलक हम इक रोज़ हो चुकेंगे बरसों से वादा-ए-शब हर सुब्ह पर रहे है 'मीर' अब बहार आई सहरा में चल जुनूँ कर कोई भी फ़स्ल-ए-गुल में नादान घर रहे है
Meer Taqi Meer
0 likes
अब 'मीर'-जी तो अच्छे ज़िंदीक़ ही बन बैठे पेशानी पे दे क़श्क़ा ज़ुन्नार पहन बैठे आज़ुर्दा दिल-ए-उलफ़त हम चुपके ही बेहतर हैं सब रो उठेगी मज्लिस जो कर के सुख़न बैठे उर्यान फिरें कब तक ऐ काश कहीं आ कर ता गर्द बयाबाँ की बाला-ए-बदन बैठे पैकान-ए-ख़दंग उस का यूँँ सीने के ऊधर है जों मार-ए-सियह कोई काढ़े हुए फन बैठे जुज़ ख़त के ख़याल उस के कुछ काम नहीं हम को सब्ज़ी पिए हम अक्सर रहते हैं मगन बैठे शमशीर-ए-सितम उस की अब गो का चले हर-दम शोरीदा-सर अपने से हम बाँध कफ़न बैठे बस हो तो इधर-ऊधर यूँँ फिरने न दें तुझ को नाचार तिरे हम ये देखें हैं चलन बैठे
Meer Taqi Meer
0 likes
कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से पर्दा उठा तो लड़ियाँ आँखें हमारी हम से सूरत-गर-ए-अजल का क्या हाथ था कहे तो खींची वो तेग़-ए-अबरू फ़ौलाद के क़लम से सोज़िश गई न दिल की रोने से रोज़-ओ-शब के जलता हूँ और दरिया बहते हैं चश्म-ए-नम से ताअ'त का वक़्त गुज़रा मस्ती में आब रज़ की अब चश्म-दाश्त उस के याँ है फ़क़त करम से कुढि़ए न रोइए तो औक़ात क्यूँँके गुज़रे रहता है मश्ग़ला सा बार-ए-ग़म-ओ-अलम से मशहूर है समाजत मेरी कि तेग़ बरसी पर मैं न सर उठाया हरगिज़ तिरे क़दम से बात एहतियात से कर ज़ाएअ'' न कर नफ़स को बालीदगी-ए-दिल है मानिंद-ए-शीशा दम से क्या क्या तअब उठाए क्या क्या अज़ाब देखे तब दिल हुआ है उतना ख़ूगर तिरे सितम से हस्ती में हम ने आ कर आसूदगी न देखी खुलतीं न काश आँखें ख़्वाब ख़ुश अदम से पामाल कर के हम को पछताओगे बहुत तुम कमयाब हैं जहाँ में सर देने वाले हम से दिल दो हो 'मीर' साहब उस बद-मआ'श को तुम ख़ातिर तो जम्अ'' कर लो टक क़ौल से क़सम से
Meer Taqi Meer
0 likes
कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था शाम से ता सुब्ह दम-ए-बालीं पे सर यकजा न था शोहरा-ए-आलम उसे युम्न-ए-मोहब्बत ने किया वर्ना मजनूँ एक ख़ाक उफ़्तादा-ए-वीराना था मंज़िल उस मह की रहा जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था इक निगाह-ए-आश्ना को भी वफ़ा करता नहीं वा हुईं मिज़्गाँ कि सब्ज़ा सब्ज़ा-ए-बेगाना था रोज़ ओ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे ऐ दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था याद अय्या में कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था जिस को देखा हम ने इस वहशत-कदे में दहर के या सिड़ी या ख़ब्ती या मजनून या दीवाना था बा'द ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था ग़ैर के कहने से मारा उन ने हम को बे-गुनाह ये न समझा वो कि वाक़े में भी कुछ था या न था सुब्ह होते वो बिना-गोश आज याद आया मुझे जो गिरा दामन पे आँसू गौहर-ए-यक-दाना था शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त शम्अ'' का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था रात उस की चश्म-ए-मयगूँ ख़्वाब में देखी थी मैं सुब्ह सोते से उठा तो सामने पैमाना था रहम कुछ पैदा किया शायद कि उस बे-रहम ने गोश उस का शब इधर ता आख़िर-ए-अफ़्साना था 'मीर' भी क्या मस्त ताफ़ेह था शराब-ए-इश्क़ का लब पे आशिक़ के हमेशा नारा-ए-मस्ताना था
Meer Taqi Meer
0 likes
बू कि हो सू-ए-बाग़ निकले है बाव से इक दिमाग़ निकले है है जो अंधेर शहर में ख़ुर्शीद दिन को ले कर चराग़ निकले है चोब-कारी ही से रहेगा शैख़ अब तो ले कर चुमाग़ निकले है दे है जुम्बिश जो वाँ की ख़ाक को बाव जिगर दाग़ दाग़ निकले है हर सहर हादिसा मिरी ख़ातिर भर के ख़ूँ का अयाग़ निकले है उस गली की ज़मीन-ए-तफ़्ता से दिल-जलों का सुराग़ निकले है शायद उस ज़ुल्फ़ से लगी है 'मीर' बाव में इक दिमाग़ निकले है
Meer Taqi Meer
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Meer Taqi Meer.
Similar Moods
More moods that pair well with Meer Taqi Meer's ghazal.







