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कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से पर्दा उठा तो लड़ियाँ आँखें हमारी हम से सूरत-गर-ए-अजल का क्या हाथ था कहे तो खींची वो तेग़-ए-अबरू फ़ौलाद के क़लम से सोज़िश गई न दिल की रोने से रोज़-ओ-शब के जलता हूँ और दरिया बहते हैं चश्म-ए-नम से ताअ'त का वक़्त गुज़रा मस्ती में आब रज़ की अब चश्म-दाश्त उस के याँ है फ़क़त करम से कुढि़ए न रोइए तो औक़ात क्यूँँके गुज़रे रहता है मश्ग़ला सा बार-ए-ग़म-ओ-अलम से मशहूर है समाजत मेरी कि तेग़ बरसी पर मैं न सर उठाया हरगिज़ तिरे क़दम से बात एहतियात से कर ज़ाएअ'' न कर नफ़स को बालीदगी-ए-दिल है मानिंद-ए-शीशा दम से क्या क्या तअब उठाए क्या क्या अज़ाब देखे तब दिल हुआ है उतना ख़ूगर तिरे सितम से हस्ती में हम ने आ कर आसूदगी न देखी खुलतीं न काश आँखें ख़्वाब ख़ुश अदम से पामाल कर के हम को पछताओगे बहुत तुम कमयाब हैं जहाँ में सर देने वाले हम से दिल दो हो 'मीर' साहब उस बद-मआ'श को तुम ख़ातिर तो जम्अ'' कर लो टक क़ौल से क़सम से

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जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़ उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़ मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ुद को बाँटा है बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़ एक तरफ़ मुझे जल्दी है उस के दिल में घर करने की एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़ यूँँ तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन तुझ से जुदा होने के बा'द का पहला हफ़्ता एक तरफ़ उस की आँखों ने मुझ सेे मेरी ख़ुद्दारी छीनी वरना पाँव की ठोकर से कर देता था मैं दुनिया एक तरफ़ मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता उस ने सहरा एक तरफ़ रक्खा और दरिया एक तरफ़

Tehzeeb Hafi

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किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम

Ahmad Faraz

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क्या करोगे मेरा जादू चल गया तो हफ़्ते भर में उस को पागल कर दिया तो बोलना अगली दफ़ा तलवार उठेगी ग़लती से भी उस के ऊपर हाथ उठा तो बद्दुआऍं मरने की दे तो रही हो और कहीं मैं सच में इस से मर गया तो जी मुझे दरअस्ल अच्छे लगते हो आप उस ने मेरी बात सुन कर के कहा तो

Kushal Dauneria

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सच बताएँ तो शर्म आती है और छुपाएँ तो शर्म आती है हम पे एहसान हैं उदासी के मुस्कुराएँ तो शर्म आती है हार की ऐसी आदतें हैं हमें जीत जाएँ तो शर्म आती है उस के आगे ही उस का बख़्शा हुआ सर उठाएँ तो शर्म आती है ऐश औकात से ज़्यादा की अब कमाएँ तो शर्म आती है धमकियाँ ख़ुद-कुशी की देते हैं कर न पाएँ तो शर्म आती है

Varun Anand

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झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं

Kaifi Azmi

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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

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मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ

Meer Taqi Meer

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मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में कपड़े उतारे उन ने सर खींचे हम कफ़न में गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में अब लाल-ए-नौ-ख़त उस के कम बख़्शते हैं फ़रहत क़ुव्वत कहाँ रहे है याक़ूती-ए-कुहन में यूसुफ़ अज़ीज़-ए-दिला जा मिस्र में हुआ था पाकीज़ा गौहरों की इज़्ज़त नहीं वतन में दैर ओ हरम से तू तो टुक गर्म-ए-नाज़ निकला हंगामा हो रहा है अब शैख़ ओ बरहमन में आ जाते शहर में तू जैसे कि आँधी आई क्या वहशतें किया हैं हम ने दिवानपन में हैं घाव दिल पर अपने तेग़-ए-ज़बाँ से सब की तब दर्द है हमारे ऐ 'मीर' हर सुख़न में

Meer Taqi Meer

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कब तलक ये सितम उठाइएगा एक दिन यूँँही जी से जाइएगा शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक कसो दिन आप में भी आइएगा सब से मिल चल कि हादसे से फिर कहीं ढूँडा भी तो न पाइएगा न मूए हम असीरी में तो नसीम कोई दिन और बाव खाइएगा कहियेगा उस से क़िस्सा-ए-मजनूँ या'नी पर्दे में ग़म सुनाइएगा उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा उस के पाँव को जा लगी है हिना ख़ूब से हाथ उसे लगाइएगा शिरकत-शैख़-ओ--ब्रहमन से 'मीर' का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद किसी वीराने में बनाइयेगा

Meer Taqi Meer

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