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hava chale varaq-e-arzu palat jaae tulua ho koi chehra to dhund chhat jaae yahi hai vaqt ki khvabon ke badban kholo kahin na phir se nadi ansuon ki ghat jaae bulandiyon ki havas hi zamin par laai kaho falak se ki ab raste se hat jaae giraft dhili karo vaqt ko guzarne do ki dor phir na kahin saaton ki kat jaae isi liye nahin sote hain ham ki duniya men shab-e-firaq ki saughhat sab men bat jaae hawa chale waraq-e-arzu palat jae tulua ho koi chehra to dhund chhat jae yahi hai waqt ki khwabon ke baadban kholo kahin na phir se nadi aansuon ki ghat jae bulandiyon ki hawas hi zamin par lai kaho falak se ki ab raste se hat jae giraft dhili karo waqt ko guzarne do ki dor phir na kahin saaton ki kat jae isi liye nahin sote hain hum ki duniya mein shab-e-firaq ki saughat sab mein bat jae

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आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद' ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं

Jawwad Sheikh

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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है

Tehzeeb Hafi

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घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर लहू लहू चेहरे कहाँ चले गए वो लोग हँसते गाते हुए न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए

Azhar Iqbal

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अब जो बाज़ार में रखे हैं तो हैरत क्या है जो भी देखेगा वो पूछेगा के क़ीमत क्या है रोज़ इन ताज़ा क़सीदों की ज़रूरत ही नहीं आप तो इतना बता दें की ज़रूरत क्या है ये जो मंदी का ज़माना है गुज़र जाने दे फिर पता तुझ को चलेगा मेरी कीमत क्या है

Rahat Indori

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कुछ ऐसे रास्तों से इश्क़ का सफ़र जाए तुम्हारा हिज्र बहुत दूर से गुज़र जाए उदासियों से भरी कच्ची उम्र की ये नस्ल जो शा'इरी न करे तो दुखों से मर जाए पचास लोगों से वो रोज़ मिलती है और मैं किसी को देख लूँ तो उस का मुँह उतर जाए घटा छटे तो दिखे चाँद भी सितारे भी जो तुम हटो तो किसी और पर नज़र जाए हज़ार साल में तय्यार होने वाला मर्द उस एक गोद में सर रखते ही बिखर जाए मैं उस बदन से सभी पैरहन उतारूँ और अँधेरा जिस्म पे कपड़े का काम कर जाए मेरी हवस को कोई दूसरा मुयस्सर हो तुम्हारा हुस्न किसी और से सँवर जाए

Kushal Dauneria

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तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा मेरी तन्हाई की रुस्वाई की मंज़िल आई वस्ल के लम्हे से मैं हिज्र की शब बदलूँगा शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूँगा

Shahryar

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दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए इस अंजुमन में आप को आना है बार बार दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिए माना कि दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास लेकिन ये क्या कि ग़ैर का एहसान लीजिए कहिए तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

Shahryar

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