ghazalKuch Alfaaz

हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कार-गर इश्क़ का उस को गुमाँ हम बे-ज़बानों पर नहीं ज़ब्त से मतलब ब-जुज़ वारस्तगी दीगर नहीं दामन-ए-तिमसाल आब-ए-आइना से तर नहीं बाइस-ए-ईज़ा है बरहम-ख़ुर्दन-ए-बज़्म-ए-सुरूर लख़्त लख़्त-ए-शीशा-ए-ब-शिकास्ता जुज़ निश्तर नहीं दिल को इज़्हार-ए-सुख़न अंदाज़-ए-फ़तह-उल-बाब है याँ सरीर-ए-ख़ामा ग़ैर-अज़-इस्तिकाक-ए-दर नहीं

Related Ghazal

बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे

Kumar Vishwas

56 likes

चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

58 likes

गाहे गाहे बस अब यही हो क्या तुम से मिल कर बहुत ख़ुशी हो क्या मिल रही हो बड़े तपाक के साथ मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या याद हैं अब भी अपने ख़्वाब तुम्हें मुझ से मिल कर उदास भी हो क्या बस मुझे यूँँही इक ख़याल आया सोचती हो तो सोचती हो क्या अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या क्या कहा इश्क़ जावेदानी है! आख़िरी बार मिल रही हो क्या हाँ फ़ज़ा याँ की सोई सोई सी है तो बहुत तेज़ रौशनी हो क्या मेरे सब तंज़ बे-असर ही रहे तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या दिल में अब सोज़-ए-इंतिज़ार नहीं शम-ए-उम्मीद बुझ गई हो क्या इस समुंदर पे तिश्ना-काम हूँ मैं बान तुम अब भी बह रही हो क्या

Jaun Elia

39 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

मैं ने तो बस मज़ाक़ में पूछा ख़राब है? वो पीर हाथ देख के बोला ख़राब है हर दिन उसे दिखाया कि कितने शरीफ़ हैं हर रात उस के बारे में सोचा ख़राब है ये इश्क़ हो चुका है तुरुप-चाल ताश की आगे ग़ुलाम के मिरा इक्का ख़राब है आज़ाद लड़कियों से भली क़ैद औरतें मतलब कि झील ठीक है दरिया ख़राब है हम जिस ख़ुदा की आस में बैठे हैं रात दिन वो जा चुका है बोल के दुनिया ख़राब है ज़्यादा किसी की मौत पे रोना नहीं सही और जन्मदिन पे शोर शराबा ख़राब है आधा भी उस के जितना मैं रौशन नहीं हुआ मैं जिस दिए को बोल रहा था ख़राब है

Kushal Dauneria

35 likes

More from Mirza Ghalib

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

0 likes

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़ न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़ विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़ हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़ न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़ फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़ ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़ हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़ 'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़ हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़

Mirza Ghalib

0 likes

कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया दिल कहाँ कि गुम कीजे हम ने मुद्दआ' पाया इश्क़ से तबीअ'त ने ज़ीस्त का मज़ा पाया दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया दोस्त-दार-ए-दुश्मन है ए'तिमाद-ए-दिल मा'लूम आह बे-असर देखी नाला ना-रसा पाया सादगी ओ पुरकारी बे-ख़ुदी ओ हुश्यारी हुस्न को तग़ाफ़ुल में जुरअत-आज़मा पाया ग़ुंचा फिर लगा खिलने आज हम ने अपना दिल ख़ूँ किया हुआ देखा गुम किया हुआ पाया हाल-ए-दिल नहीं मा'लूम लेकिन इस क़दर या'नी हम ने बार-हा ढूँडा तुम ने बार-हा पाया शोर-ए-पंद-ए-नासेह ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का आप से कोई पूछे तुम ने क्या मज़ा पाया है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब हम ने दश्त-ए-इम्काँ को एक नक़्श-ए-पा पाया बे-दिमाग़-ए-ख़जलत हूँ रश्क-ए-इम्तिहाँ ता-कै एक बेकसी तुझ को आलम-आश्ना पाया ख़ाक-बाज़ी-ए-उम्मीद कार-ख़ाना-ए-तिफ़्ली यास को दो-आलम से लब-ब-ख़ंदा वा पाया क्यूँँ न वहशत-ए-ग़ालिब बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो कुश्ता-ए-तग़ाफ़ुल को ख़स्म-ए-ख़ूँ-बहा पाया फ़िक्र-ए-नाला में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा उज़्व उज़्व जूँ ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया शब नज़ारा-परवर था ख़्वाब में ख़याल उस का सुब्ह मौजा-ए-गुल को नक़्श-ए-बोरिया पाया जिस क़दर जिगर ख़ूँ हो कूचा दादन-ए-गुल है ज़ख्म-ए-तेग़-ए-क़ातिल को तुर्फ़ा दिल-कुशा पाया है मकीं की पा-दारी नाम-ए-साहिब-ए-ख़ाना हम से तेरे कूचे ने नक़्श-ए-मुद्दआ पाया ने 'असद' जफ़ा-साइल ने सितम जुनूँ-माइल तुझ को जिस क़दर ढूँडा उल्फ़त-आज़मा पाया

Mirza Ghalib

1 likes

दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया आतिश-ए-ख़ामोश की मानिंद गोया जल गया दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया मैं अदम से भी परे हूँ वर्ना ग़ाफ़िल बार-हा मेरी आह-ए-आतिशीं से बाल-ए-अन्क़ा जल गया अर्ज़ कीजे जौहर-ए-अंदेशा की गर्मी कहाँ कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सहरा जल गया दिल नहीं तुझ को दिखाता वर्ना दाग़ों की बहार इस चराग़ाँ का करूँँ क्या कार-फ़रमा जल गया मैं हूँ और अफ़्सुर्दगी की आरज़ू 'ग़ालिब' कि दिल देख कर तर्ज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया ख़ानमान-ए-आशिक़ाँ दुकान-ए-आतिश-बाज़ है शो'ला-रू जब हो गए गर्म-ए-तमाशा जल गया ता कुजा अफ़सोस-ए-गरमी-हा-ए-सोहबत ऐ ख़याल दिल बा-सोज़-ए-आतिश-ए-दाग़-ए-तमन्ना जल गया है 'असद' बेगाना-ए-अफ़्सुर्दगी ऐ बेकसी दिल ज़-अंदाज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया दूद मेरा सुंबुलिस्ताँ से करे है हम-सरी बस-कि शौक़-ए-आतिश-गुल से सरापा जल गया शम्अ-रूयाँ की सर-अंगुश्त-ए-हिनाई देख कर ग़ुंचा-ए-गुल पर-फ़िशाँ परवाना-आसा जल गया

Mirza Ghalib

0 likes

चाहिए अच्छों को जितना चाहिए ये अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए सोहबत-ए-रिंदाँ से वाजिब है हज़र जा-ए-मय अपने को खींचा चाहिए चाहने को तेरे क्या समझा था दिल बारे अब इस से भी समझा चाहिए चाक मत कर जैब बे-अय्याम-ए-गुल कुछ उधर का भी इशारा चाहिए दोस्ती का पर्दा है बेगानगी मुँह छुपाना हम से छोड़ा चाहिए दुश्मनी ने मेरी खोया ग़ैर को किस क़दर दुश्मन है देखा चाहिए अपनी रुस्वाई में क्या चलती है स'ई यार ही हंगामा-आरा चाहिए मुनहसिर मरने पे हो जिस की उमीद ना-उमीदी उस की देखा चाहिए ग़ाफ़िल इन मह-तलअ'तों के वास्ते चाहने वाला भी अच्छा चाहिए चाहते हैं ख़ूब-रूयों को 'असद' आप की सूरत तो देखा चाहिए

Mirza Ghalib

2 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Mirza Ghalib.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Mirza Ghalib's ghazal.