ghazalKuch Alfaaz

husn ko chand javani ko kanval kahte hain un ki surat nazar aae to ghhazal kahte hain uf vo marmar se tarasha hua shaffaf badan dekhne vaale use taj-mahal kahte hain vo tire husn ki qimat se nahin hain vaqif pankhudi ko jo tire lab ka badal kahte hain pad gai paanv men taqdir ki zanjir to kya ham to us ko bhi tiri zulf ka bal kahte hain husn ko chand jawani ko kanwal kahte hain un ki surat nazar aae to ghazal kahte hain uf wo marmar se tarasha hua shaffaf badan dekhne wale use taj-mahal kahte hain wo tere husn ki qimat se nahin hain waqif pankhudi ko jo tere lab ka badal kahte hain pad gai panw mein taqdir ki zanjir to kya hum to us ko bhi teri zulf ka bal kahte hain

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़िरी हिचकी तिरे ज़ानू पे आए मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ

Qateel Shifai

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राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँँ ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम बदल जाता है इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ दुश्मनी मुझ से किए जा मगर अपना बन कर जान ले ले मिरी सय्याद मगर प्यार के साथ दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी 'ग़ालिब' से 'क़तील' हज़रत 'ज़ौक़' तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ

Qateel Shifai

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तितलियों का रंग हो या झूमते बादल का रंग हम ने हर इक रंग को जाना तिरे आँचल का रंग तेरी आँखों की चमक है या सितारों की ज़िया रात का है घुप अँधेरा या तिरे काजल का रंग धड़कनों के ताल पर वो हाल अपने दिल का है जैसे गोरी के थिरकते पाँव में पायल का रंग फेंकना तुम सोच कर लफ़्ज़ों का ये कड़वा गुलाल फैल जाता है कभी सदियों पे भी इक पल का रंग आह ये रंगीन मौसम ख़ून की बरसात का छा रहा है अक़्ल पर जज़्बात की हलचल का रंग अब तो शबनम का हर इक मोती है कंकर की तरह हाँ उसी गुलशन पे छाया था कभी मख़मल का रंग फिर रहे हैं लोग हाथों में लिए ख़ंजर खुले कूचे कूचे में अब आता है नज़र मक़्तल का रंग चार जानिब जिस की रा'नाई के चर्चे हैं 'क़तील' जाने कब देखेंगे हम उस आने वाली कल का रंग

Qateel Shifai

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परेशां रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ हंसो और हंसते-हंसते डूबते जाओ ख़लाओं में हमीं पे रात भारी है सितारो तुम तो सो जाओ हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा यही क़िस्मत हमारी है सितारो तुम तो सो जाओ तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया ये बाज़ी हम ने हारी है सितारो तुम तो सो जाओ कहे जाते हो रो रो कर हमारा हाल दुनिया से ये कैसी राज़दारी है सितारो तुम तो सो जाओ हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ

Qateel Shifai

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खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँँ करें किसी में तलाश अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें 'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें

Qateel Shifai

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