हुस्न-परी हो साथ और बे-मौसम की बारिश हो जाए छतरी कौन ख़रीदेगा फिर जितनी बारिश हो जाए ऐसी प्यास की शिद्दत है कि मैं ये दुआएँ करता हूँ जितने समुंदर हैं दुनिया में सब की बारिश हो जाए मेरी ग़ज़लें उस के साथ बिताए वक़्त का हासिल हैं वैसी फ़स्लें उग आती हैं जैसी बारिश हो जाए छोटे छोटे तालाबों से पानी छीना जाता है तुम तो बस ये कह देते हो थोड़ी बारिश हो जाए आँधी आए बिजली कड़के काली घटाएँ छाने लगें मजबूरन वो रुके मिरे घर इतनी बारिश हो जाए तंग आया हूँ मैं इस हिज्र-ओ-वस्ल की बूँदा-बाँदी से या तो सूखा पड़ जाए या ढंग की बारिश हो जाए
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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तुझे भी अपने साथ रखता और उसे भी अपना दीवाना बना लेता अगर मैं चाहता तो दिल में कोई चोर दरवाज़ा बना लेता मैं अपने ख़्वाब पूरे कर के ख़ुश हूँ पर ये पछतावा नहीं जाता के मुस्तक़बिल बनाने से तो अच्छा था तुझे अपना बना लेता अकेला आदमी हूँ और अचानक आए हो, जो कुछ था हाजिर है अगर तुम आने से पहले बता देते तो कुछ अच्छा बना लेता
Tehzeeb Hafi
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क्या कहेगा कभी मिलने भी अगर आएगा वो अब वफ़ादारी की क़स्में तो नहीं खाएगा वो हम समझते थे कि हम उस को भुला सकते हैं वो समझता था हमें भूल नहीं पाएगा वो कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था याद बन जाएगा वो ख़्वाब नज़र आएगा वो सब के होते हुए इक रोज़ वो तन्हा होगा फिर वो ढूँढेगा हमें और नहीं पाएगा वो इत्तिफ़ाक़न जो कभी सामने आया 'अजमल' अब वो तन्हा तो न होगा जो ठहर जाएगा वो
Ajmal Siraj
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ये इश्क़ वो है जिस ने बहर-ओ-बर ख़राब कर दिया हमें तो उस ने जैसे ख़ास कर ख़राब कर दिया मैं दिल पे हाथ रख के तुझ को शहर भेज दूँ मगर तुझे भी उन हवाओं ने अगर ख़राब कर दिया किसी ने नाम लिख के और किसी ने पींग डाल के मोहब्बतों की आड़ में शजर ख़राब कर दिया तुम्हें ही देखने में महव है वो काम छोड़कर तुम्हारी कार ने तो कारीगर ख़राब कर दिया मैं क़ाफ़िले के साथ हूँ मगर मुझे ये ख़ौफ़ है अगर किसी ने मेरा हम सफ़र ख़राब कर दिया तेरी नज़र के मैक़दे तमाम शब खुले रहे तेरी शराब ने मेरा जिगर ख़राब कर दिया
Tehzeeb Hafi
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यहाँ पे ढूँडे से भी फ़रिश्ते नहीं मिलेंगे ज़मीं है साहब यहाँ तो अहल-ए-ज़मीं मिलेंगे परेशाँ मत हो कि यार टेढ़ी लकीरें हैं हम कहाँ का तो कुछ पता नहीं पर कहीं मिलेंगे कुछ ऐसे ग़म हैं जो दिल में हरगिज़ नहीं ठहरते मकान होते हुए सड़क पर मकीं मिलेंगे ज़मीं पे मिलने न देंगे हम को ज़माने वाले चलो कि मरते हैं दोनों ज़ेर-ए-ज़मीं मिलेंगे हमारे दिल में बनी हुई हैं हज़ारों क़ब्रें हर एक तुर्बत में दफ़्न ज़िंदा यक़ीं मिलेंगे रखा गया है हमें कुछ ऐसे मुग़ालते में वहाँ मिलेंगे जहाँ पे अर्श-ओ-ज़मीं मिलेंगे हमें तो हूरें मिलेंगी हम से बना के रक्खो तुम्हें वहाँ पर भी जा के केवल हमीं मिलेंगे
Ahmad Azeem
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अगर वो पूछे कोई बात क्या बुरी लगी है ज़ियादा सोचना मत बोल देना जी लगी है बुरी लगी तिरी मौजूदगी क्लास में आज कि मेरे बोले बिना तेरी हाज़िरी लगी है उसे मनाते मनाते मैं रूठने लगा था फिर उस ने पूछ लिया फ़िल्म कौन सी लगी है ऐ मौत ठहर ज़रा सब्र कर क़तार में देख कि तुझ से आगे बहुत आगे ज़िंदगी लगी है घड़ी में वक़्त घटाते हुए मैं भूल गया कि यार उस की भी दीवार पर घड़ी लगी है
Ahmad Azeem
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