ghazalKuch Alfaaz

अगर वो पूछे कोई बात क्या बुरी लगी है ज़ियादा सोचना मत बोल देना जी लगी है बुरी लगी तिरी मौजूदगी क्लास में आज कि मेरे बोले बिना तेरी हाज़िरी लगी है उसे मनाते मनाते मैं रूठने लगा था फिर उस ने पूछ लिया फ़िल्म कौन सी लगी है ऐ मौत ठहर ज़रा सब्र कर क़तार में देख कि तुझ से आगे बहुत आगे ज़िंदगी लगी है घड़ी में वक़्त घटाते हुए मैं भूल गया कि यार उस की भी दीवार पर घड़ी लगी है

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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यहाँ पे ढूँडे से भी फ़रिश्ते नहीं मिलेंगे ज़मीं है साहब यहाँ तो अहल-ए-ज़मीं मिलेंगे परेशाँ मत हो कि यार टेढ़ी लकीरें हैं हम कहाँ का तो कुछ पता नहीं पर कहीं मिलेंगे कुछ ऐसे ग़म हैं जो दिल में हरगिज़ नहीं ठहरते मकान होते हुए सड़क पर मकीं मिलेंगे ज़मीं पे मिलने न देंगे हम को ज़माने वाले चलो कि मरते हैं दोनों ज़ेर-ए-ज़मीं मिलेंगे हमारे दिल में बनी हुई हैं हज़ारों क़ब्रें हर एक तुर्बत में दफ़्न ज़िंदा यक़ीं मिलेंगे रखा गया है हमें कुछ ऐसे मुग़ालते में वहाँ मिलेंगे जहाँ पे अर्श-ओ-ज़मीं मिलेंगे हमें तो हूरें मिलेंगी हम से बना के रक्खो तुम्हें वहाँ पर भी जा के केवल हमीं मिलेंगे

Ahmad Azeem

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हुस्न-परी हो साथ और बे-मौसम की बारिश हो जाए छतरी कौन ख़रीदेगा फिर जितनी बारिश हो जाए ऐसी प्यास की शिद्दत है कि मैं ये दुआएँ करता हूँ जितने समुंदर हैं दुनिया में सब की बारिश हो जाए मेरी ग़ज़लें उस के साथ बिताए वक़्त का हासिल हैं वैसी फ़स्लें उग आती हैं जैसी बारिश हो जाए छोटे छोटे तालाबों से पानी छीना जाता है तुम तो बस ये कह देते हो थोड़ी बारिश हो जाए आँधी आए बिजली कड़के काली घटाएँ छाने लगें मजबूरन वो रुके मिरे घर इतनी बारिश हो जाए तंग आया हूँ मैं इस हिज्र-ओ-वस्ल की बूँदा-बाँदी से या तो सूखा पड़ जाए या ढंग की बारिश हो जाए

Ahmad Azeem

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