ghazalKuch Alfaaz

यहाँ पे ढूँडे से भी फ़रिश्ते नहीं मिलेंगे ज़मीं है साहब यहाँ तो अहल-ए-ज़मीं मिलेंगे परेशाँ मत हो कि यार टेढ़ी लकीरें हैं हम कहाँ का तो कुछ पता नहीं पर कहीं मिलेंगे कुछ ऐसे ग़म हैं जो दिल में हरगिज़ नहीं ठहरते मकान होते हुए सड़क पर मकीं मिलेंगे ज़मीं पे मिलने न देंगे हम को ज़माने वाले चलो कि मरते हैं दोनों ज़ेर-ए-ज़मीं मिलेंगे हमारे दिल में बनी हुई हैं हज़ारों क़ब्रें हर एक तुर्बत में दफ़्न ज़िंदा यक़ीं मिलेंगे रखा गया है हमें कुछ ऐसे मुग़ालते में वहाँ मिलेंगे जहाँ पे अर्श-ओ-ज़मीं मिलेंगे हमें तो हूरें मिलेंगी हम से बना के रक्खो तुम्हें वहाँ पर भी जा के केवल हमीं मिलेंगे

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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हुस्न-परी हो साथ और बे-मौसम की बारिश हो जाए छतरी कौन ख़रीदेगा फिर जितनी बारिश हो जाए ऐसी प्यास की शिद्दत है कि मैं ये दुआएँ करता हूँ जितने समुंदर हैं दुनिया में सब की बारिश हो जाए मेरी ग़ज़लें उस के साथ बिताए वक़्त का हासिल हैं वैसी फ़स्लें उग आती हैं जैसी बारिश हो जाए छोटे छोटे तालाबों से पानी छीना जाता है तुम तो बस ये कह देते हो थोड़ी बारिश हो जाए आँधी आए बिजली कड़के काली घटाएँ छाने लगें मजबूरन वो रुके मिरे घर इतनी बारिश हो जाए तंग आया हूँ मैं इस हिज्र-ओ-वस्ल की बूँदा-बाँदी से या तो सूखा पड़ जाए या ढंग की बारिश हो जाए

Ahmad Azeem

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अगर वो पूछे कोई बात क्या बुरी लगी है ज़ियादा सोचना मत बोल देना जी लगी है बुरी लगी तिरी मौजूदगी क्लास में आज कि मेरे बोले बिना तेरी हाज़िरी लगी है उसे मनाते मनाते मैं रूठने लगा था फिर उस ने पूछ लिया फ़िल्म कौन सी लगी है ऐ मौत ठहर ज़रा सब्र कर क़तार में देख कि तुझ से आगे बहुत आगे ज़िंदगी लगी है घड़ी में वक़्त घटाते हुए मैं भूल गया कि यार उस की भी दीवार पर घड़ी लगी है

Ahmad Azeem

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