ghazalKuch Alfaaz

तुझे भी अपने साथ रखता और उसे भी अपना दीवाना बना लेता अगर मैं चाहता तो दिल में कोई चोर दरवाज़ा बना लेता मैं अपने ख़्वाब पूरे कर के ख़ुश हूँ पर ये पछतावा नहीं जाता के मुस्तक़बिल बनाने से तो अच्छा था तुझे अपना बना लेता अकेला आदमी हूँ और अचानक आए हो, जो कुछ था हाजिर है अगर तुम आने से पहले बता देते तो कुछ अच्छा बना लेता

Tehzeeb Hafi52 Likes

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था

Tehzeeb Hafi

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अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मेरा वो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी न जाने कितने परिंदों ने इस में शिरकत की कल एक पेड़ की तरक़ीब-ए-रू-नुमाई थी हवाओं आओ मिरे गाँव की तरफ़ देखो जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी किसी सिपाह ने ख़े में लगा दिए हैं वहाँ जहाँ ये मैं ने निशानी तिरी दबाई थी गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी

Tehzeeb Hafi

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ये एक बात समझने में रात हो गई है मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूंगा सोचा था तिरी जुदाई ही वजह-ए-नशात हो गई है बदन में एक तरफ़ दिन जुलूअ मैं ने किया बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है मैं जंगलों की तरफ़ चल पडा हूँ छोड़ के घर ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र मैं नज़्म लिखने लगा था कि नात हो गई है

Tehzeeb Hafi

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मौसमों के तग़य्युर को भाँपा नहीं छतरियाँ खोल दीं ज़ख़्म भरने से पहले किसी ने मिरी पट्टियाँ खोल दीं हम मछेरों से पूछो समुंदर नहीं है ये इफ़रीत है तुम ने क्या सोच कर साहिलों से बँधी कश्तियाँ खोल दीं उस ने वा'दों के पर्बत से लटके हुओं को सहारा दिया उस की आवाज़ पर कोह-पैमाओं ने रस्सियाँ खोल दीं दश्त-ए-ग़ुर्बत में मैं और मिरा यार-ए-शब-ज़ाद बाहम मिले यार के पास जो कुछ भी था यार ने गठरियाँ खोल दीं कुछ बरस तो तिरी याद की रेल दिल से गुज़रती रही और फिर मैं ने थक हार के एक दिन पटरियाँ खोल दीं उस ने सहराओं की सैर करते हुए इक शजर के तले अपनी आँखों से ऐनक उतारी कि दो हिरनियाँ खोल दीं आज हम कर चुके अहद-ए-तर्क-ए-सुख़न पर रक़म दस्तख़त आज हम ने नए शाइ'रों के लिए भर्तियाँ खोल दीं

Tehzeeb Hafi

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इक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ अपनी मस्ती में बहता दरिया हूँ मैं किनारा भी हूँ भँवर भी हूँ आसमाँ और ज़मीं की वुसअत देख मैं इधर भी हूँ और उधर भी हूँ ख़ुद ही मैं ख़ुद को लिख रहा हूँ ख़त और मैं अपना नामा-बर भी हूँ दास्ताँ हूँ मैं इक तवील मगर तू जो सुन ले तो मुख़्तसर भी हूँ एक फलदार पेड़ हूँ लेकिन वक़्त आने पे बे-समर भी हूँ

Tehzeeb Hafi

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