ये एक बात समझने में रात हो गई है मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूंगा सोचा था तिरी जुदाई ही वजह-ए-नशात हो गई है बदन में एक तरफ़ दिन जुलूअ मैं ने किया बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है मैं जंगलों की तरफ़ चल पडा हूँ छोड़ के घर ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र मैं नज़्म लिखने लगा था कि नात हो गई है
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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अश्क ज़ाएअ'' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानहे गुज़रे पर इन आँखों को क्या मेरा दुख ये है कि मेरा हम-सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मिरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस से था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मेरा वो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी न जाने कितने परिंदों ने इस में शिरकत की कल एक पेड़ की तरक़ीब-ए-रू-नुमाई थी हवाओं आओ मिरे गाँव की तरफ़ देखो जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी किसी सिपाह ने ख़े में लगा दिए हैं वहाँ जहाँ ये मैं ने निशानी तिरी दबाई थी गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी
Tehzeeb Hafi
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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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जब उस की तस्वीर बनाया करता था कमरा रंगों से भर जाया करता था पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे मैं जंगल में पानी लाया करता था थक जाता था बादल साया करते करते और फिर मैं बादल पे साया करता था बैठा रहता था साहिल पे सारा दिन दरिया मुझ से जान छुड़ाया करता था बिंत-ए-सहरा रूठा करती थी मुझ से मैं सहरा से रेत चुराया करता था
Tehzeeb Hafi
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आज जिन झीलों का बस काग़ज़ में नक़्शा रह गया एक मुद्दत तक मैं उन आँखों से बहता रह गया मैं उसे ना-क़ाबिल-ए-बर्दाश्त समझा था मगर वो मेरे दिल में रहा और अच्छा ख़ासा रह गया वो जो आधे थे तुझे मिल कर मुक़म्मल हो गए जो मुक़म्मल था वो तेरे ग़म में आधा रह गया
Tehzeeb Hafi
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