ghazalKuch Alfaaz

हुस्न तेरा ग़ुरूर मेरा था सच तो ये है क़ुसूर मेरा था रात यूँँ तेरे ख़्वाब से गुज़रा कि बदन चूर चूर मेरा था आइने में जमाल था तेरा तेरे चेहरे पे नूर मेरा था आँख की हर ज़बान पर कल तक बोलने में उबूर मेरा था उस की बातों में नाम मेरा न था ज़िक्र बैनस्सुतूर मेरा था एक ही वक़्त में जुनून-ओ-ख़िरद ला-शुऊ'र-ओ-शुऊ'र मेरा था

Amir Ameer3 Likes

Related Ghazal

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

70 likes

फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

53 likes

सबने दिल से उसे उतारा था वो मरी कब थी उस को मारा था पैरों में गिरके जीता था जिस को उस को पाने में ख़ुद को हारा था तेरे मेरे में बट गया सब कुछ एक टाइम था सब हमारा था उस की यादों में दिल जले है अब जिस का चेहरा नहीं गवारा था मैं ने वो खोया जो मेरा नहीं था तुम ने वो खोया जो तुम्हारा था जीत सकता था उस सेे मैं कातिब पर बड़े हौसले से हारा था

Himanshi babra KATIB

43 likes

चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

103 likes

More from Amir Ameer

ये मेरा अक्स जो ठहरा तिरी निगाह में है नहीं है प्यार तो फिर क्या तिरी सलाह में है नहीं है वक़्त की जुरअत कि छू सके उस को ये तेरा हुस्न कि जब तक मिरी पनाह में है नज़र जो तुझ पे रुके तो ज़रा नहीं सुनती कहाँ सवाब में है ये कहाँ गुनाह में है ज़बाँ सँभाल के अब नाम ले रक़ीब उस का जो तेरा प्यार था वो अब मिरे निकाह में है

Amir Ameer

5 likes

प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था साँस उठाई उम्र समेटी चलने की तय्यारी की

Amir Ameer

4 likes

ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगी जो मैं भी रूठा तो सुब्ह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगन तो सोच ले कितनी सूनी सूनी तिरी कलाई पड़ी रहेगी हमारे घर से यूँँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँ मोहल्ले-भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगा वहीं पे इक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्मा हमारे घर में तो ऐसी बातों से ही लड़ाई पड़ी रहेगी और अब मिठाई की क्या ज़रूरत मैं तुझ से मिल-जुल के जा रहा हूँ मगर है अफ़्सोस तेरे हाथों की रस मलाई पड़ी रहेगी मुझे तो ऑफ़िस के आठ घंटों से होल आता है सोच कर ये हमारे माबैन रोज़ बरसों की ये जुदाई पड़ी रहेगी जो मेरी मानो तो मेरे ऑफ़िस मैं कोई मर्ज़ी की जॉब कर लो कि हम ने क्या काम-वाम करना है कारवाई पड़ी रहेगी हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रखेंगे रात सारी कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी इस एक बिस्तर पे आज कोई नई कहानी जन्म न ले ले अगर यूँँ ही इस पे सिलवटों से भरी रज़ाई पड़ी रहेगी मिरी मोहब्बत के तीन दर्जे हैं सहल मुश्किल या ग़ैर-मुमकिन तो एक हिस्सा ही झेल पाएगी दो तिहाई पड़ी रहेगी

Amir Ameer

7 likes

बजाए कोई शहनाई मुझे अच्छा नहीं लगता मोहब्बत का तमाशाई मुझे अच्छा नहीं लगता वो जब बिछड़े थे हम तो याद है गर्मी की छुट्टीयाँ थीं तभी से माह जुलाई मुझे अच्छा नहीं लगता वो शरमाती है इतना कि हमेशा उस की बातों का क़रीबन एक चौथाई मुझे अच्छा नहीं लगता न-जाने इतनी कड़वाहट कहाँ से आ गई मुझ में करे जो मेरी अच्छाई मुझे अच्छा नहीं लगता मिरे दुश्मन को इतनी फ़ौक़ियत तो है बहर-सूरत कि तू है उस की हम-साई मुझे अच्छा नहीं लगता न इतनी दाद दो जिस में मिरी आवाज़ दब जाए करे जो यूँँ पज़ीराई मुझे अच्छा नहीं लगता तिरी ख़ातिर नज़र-अंदाज़ करता हूँ उसे वर्ना वो जो है ना तिरा भाई मुझे अच्छा नहीं लगता

Amir Ameer

4 likes

वो रूठी रूठी ये कह रही थी क़रीब आओ मुझे मनाओ हो मर्द तो आगे बढ़ के मुझ को गले लगाओ मुझे मनाओ मैं कल से नाराज़ हूँ क़सम से और एक कोने में जा पड़ी हूँ हाँ मैं ग़लत हूँ दिखाओ फिर भी तुम्हीं झुकाओ मुझे मनाओ तुम्हारे नख़रों से अपनी अन-बन तो बढ़ती जाएगी सुन रहे हो तुम एक सॉरी से ख़त्म कर सकते हो तनाव मुझे मनाओ तुम्हें पता भी है किस सखी से तुम्हारा पाला पड़ा हुआ है मुआ'फ़ कर दूँगी तुम को फ़ौरन ही आओ आओ मुझे मनाओ मुझे यूँँ अपने से दूर कर के न ख़ुश रहोगे ग़ुरूर कर के सो मुझ से कुछ फ़ासले पे रक्खो ये रख-रखाव मुझे मनाओ मुझे बताओ कि मेरी नाराज़गी से तुम को है फ़र्क़ कोई मैं खा रही हूँ न-जाने कब से ही पेच-ताव मुझे मनाओ मुझे पता है मुझे मनाने को तुम भी बेचैन हो रहे हो तो क्या ज़रूरी है तुम भी इतने भरम दिखाओ मुझे मनाओ मिरा इरादा तो पहले ही से है मान जाने का सच बताऊँ तुम अपने भर भी तमाम हर्बों को आज़माओ मुझे मनाओ बहुत बुरे हो मिरी दिखावे की नींद को भी तुम अस्ल समझे कहीं से सीखो पियार करना मुझे जगाओ मुझे मनाओ तुम अपने अंदाज़ में कि जैसे चढ़ा के रखते हो आस्तीनें तो मैं ''तुम्हारा'' रदीफ़ वाली ग़ज़ल सुनाओ मुझे मनाओ ख़िलाफ़-ए-मा'मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूँ कि फिर कभी मुझ से करते रहना ये भाव-ताव मुझे मनाओ मैं परले दर्जे का हट-धरम था कि फिर भी उस को मना न पाया सो अब भी कानों में गूँजता है मुझे मनाओ मुझे मनाओ

Amir Ameer

12 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Amir Ameer.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Amir Ameer's ghazal.