हुस्न तेरा ग़ुरूर मेरा था सच तो ये है क़ुसूर मेरा था रात यूँँ तेरे ख़्वाब से गुज़रा कि बदन चूर चूर मेरा था आइने में जमाल था तेरा तेरे चेहरे पे नूर मेरा था आँख की हर ज़बान पर कल तक बोलने में उबूर मेरा था उस की बातों में नाम मेरा न था ज़िक्र बैनस्सुतूर मेरा था एक ही वक़्त में जुनून-ओ-ख़िरद ला-शुऊ'र-ओ-शुऊ'र मेरा था
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी
Kumar Vishwas
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सबने दिल से उसे उतारा था वो मरी कब थी उस को मारा था पैरों में गिरके जीता था जिस को उस को पाने में ख़ुद को हारा था तेरे मेरे में बट गया सब कुछ एक टाइम था सब हमारा था उस की यादों में दिल जले है अब जिस का चेहरा नहीं गवारा था मैं ने वो खोया जो मेरा नहीं था तुम ने वो खोया जो तुम्हारा था जीत सकता था उस सेे मैं कातिब पर बड़े हौसले से हारा था
Himanshi babra KATIB
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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ये मेरा अक्स जो ठहरा तिरी निगाह में है नहीं है प्यार तो फिर क्या तिरी सलाह में है नहीं है वक़्त की जुरअत कि छू सके उस को ये तेरा हुस्न कि जब तक मिरी पनाह में है नज़र जो तुझ पे रुके तो ज़रा नहीं सुनती कहाँ सवाब में है ये कहाँ गुनाह में है ज़बाँ सँभाल के अब नाम ले रक़ीब उस का जो तेरा प्यार था वो अब मिरे निकाह में है
Amir Ameer
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प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था साँस उठाई उम्र समेटी चलने की तय्यारी की
Amir Ameer
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ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगी जो मैं भी रूठा तो सुब्ह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगन तो सोच ले कितनी सूनी सूनी तिरी कलाई पड़ी रहेगी हमारे घर से यूँँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँ मोहल्ले-भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगा वहीं पे इक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्मा हमारे घर में तो ऐसी बातों से ही लड़ाई पड़ी रहेगी और अब मिठाई की क्या ज़रूरत मैं तुझ से मिल-जुल के जा रहा हूँ मगर है अफ़्सोस तेरे हाथों की रस मलाई पड़ी रहेगी मुझे तो ऑफ़िस के आठ घंटों से होल आता है सोच कर ये हमारे माबैन रोज़ बरसों की ये जुदाई पड़ी रहेगी जो मेरी मानो तो मेरे ऑफ़िस मैं कोई मर्ज़ी की जॉब कर लो कि हम ने क्या काम-वाम करना है कारवाई पड़ी रहेगी हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रखेंगे रात सारी कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी इस एक बिस्तर पे आज कोई नई कहानी जन्म न ले ले अगर यूँँ ही इस पे सिलवटों से भरी रज़ाई पड़ी रहेगी मिरी मोहब्बत के तीन दर्जे हैं सहल मुश्किल या ग़ैर-मुमकिन तो एक हिस्सा ही झेल पाएगी दो तिहाई पड़ी रहेगी
Amir Ameer
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बजाए कोई शहनाई मुझे अच्छा नहीं लगता मोहब्बत का तमाशाई मुझे अच्छा नहीं लगता वो जब बिछड़े थे हम तो याद है गर्मी की छुट्टीयाँ थीं तभी से माह जुलाई मुझे अच्छा नहीं लगता वो शरमाती है इतना कि हमेशा उस की बातों का क़रीबन एक चौथाई मुझे अच्छा नहीं लगता न-जाने इतनी कड़वाहट कहाँ से आ गई मुझ में करे जो मेरी अच्छाई मुझे अच्छा नहीं लगता मिरे दुश्मन को इतनी फ़ौक़ियत तो है बहर-सूरत कि तू है उस की हम-साई मुझे अच्छा नहीं लगता न इतनी दाद दो जिस में मिरी आवाज़ दब जाए करे जो यूँँ पज़ीराई मुझे अच्छा नहीं लगता तिरी ख़ातिर नज़र-अंदाज़ करता हूँ उसे वर्ना वो जो है ना तिरा भाई मुझे अच्छा नहीं लगता
Amir Ameer
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वो रूठी रूठी ये कह रही थी क़रीब आओ मुझे मनाओ हो मर्द तो आगे बढ़ के मुझ को गले लगाओ मुझे मनाओ मैं कल से नाराज़ हूँ क़सम से और एक कोने में जा पड़ी हूँ हाँ मैं ग़लत हूँ दिखाओ फिर भी तुम्हीं झुकाओ मुझे मनाओ तुम्हारे नख़रों से अपनी अन-बन तो बढ़ती जाएगी सुन रहे हो तुम एक सॉरी से ख़त्म कर सकते हो तनाव मुझे मनाओ तुम्हें पता भी है किस सखी से तुम्हारा पाला पड़ा हुआ है मुआ'फ़ कर दूँगी तुम को फ़ौरन ही आओ आओ मुझे मनाओ मुझे यूँँ अपने से दूर कर के न ख़ुश रहोगे ग़ुरूर कर के सो मुझ से कुछ फ़ासले पे रक्खो ये रख-रखाव मुझे मनाओ मुझे बताओ कि मेरी नाराज़गी से तुम को है फ़र्क़ कोई मैं खा रही हूँ न-जाने कब से ही पेच-ताव मुझे मनाओ मुझे पता है मुझे मनाने को तुम भी बेचैन हो रहे हो तो क्या ज़रूरी है तुम भी इतने भरम दिखाओ मुझे मनाओ मिरा इरादा तो पहले ही से है मान जाने का सच बताऊँ तुम अपने भर भी तमाम हर्बों को आज़माओ मुझे मनाओ बहुत बुरे हो मिरी दिखावे की नींद को भी तुम अस्ल समझे कहीं से सीखो पियार करना मुझे जगाओ मुझे मनाओ तुम अपने अंदाज़ में कि जैसे चढ़ा के रखते हो आस्तीनें तो मैं ''तुम्हारा'' रदीफ़ वाली ग़ज़ल सुनाओ मुझे मनाओ ख़िलाफ़-ए-मा'मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूँ कि फिर कभी मुझ से करते रहना ये भाव-ताव मुझे मनाओ मैं परले दर्जे का हट-धरम था कि फिर भी उस को मना न पाया सो अब भी कानों में गूँजता है मुझे मनाओ मुझे मनाओ
Amir Ameer
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