ये मेरा अक्स जो ठहरा तिरी निगाह में है नहीं है प्यार तो फिर क्या तिरी सलाह में है नहीं है वक़्त की जुरअत कि छू सके उस को ये तेरा हुस्न कि जब तक मिरी पनाह में है नज़र जो तुझ पे रुके तो ज़रा नहीं सुनती कहाँ सवाब में है ये कहाँ गुनाह में है ज़बाँ सँभाल के अब नाम ले रक़ीब उस का जो तेरा प्यार था वो अब मिरे निकाह में है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था साँस उठाई उम्र समेटी चलने की तय्यारी की
Amir Ameer
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हुस्न तेरा ग़ुरूर मेरा था सच तो ये है क़ुसूर मेरा था रात यूँँ तेरे ख़्वाब से गुज़रा कि बदन चूर चूर मेरा था आइने में जमाल था तेरा तेरे चेहरे पे नूर मेरा था आँख की हर ज़बान पर कल तक बोलने में उबूर मेरा था उस की बातों में नाम मेरा न था ज़िक्र बैनस्सुतूर मेरा था एक ही वक़्त में जुनून-ओ-ख़िरद ला-शुऊ'र-ओ-शुऊ'र मेरा था
Amir Ameer
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ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगी जो मैं भी रूठा तो सुब्ह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगन तो सोच ले कितनी सूनी सूनी तिरी कलाई पड़ी रहेगी हमारे घर से यूँँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँ मोहल्ले-भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगा वहीं पे इक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्मा हमारे घर में तो ऐसी बातों से ही लड़ाई पड़ी रहेगी और अब मिठाई की क्या ज़रूरत मैं तुझ से मिल-जुल के जा रहा हूँ मगर है अफ़्सोस तेरे हाथों की रस मलाई पड़ी रहेगी मुझे तो ऑफ़िस के आठ घंटों से होल आता है सोच कर ये हमारे माबैन रोज़ बरसों की ये जुदाई पड़ी रहेगी जो मेरी मानो तो मेरे ऑफ़िस मैं कोई मर्ज़ी की जॉब कर लो कि हम ने क्या काम-वाम करना है कारवाई पड़ी रहेगी हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रखेंगे रात सारी कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी इस एक बिस्तर पे आज कोई नई कहानी जन्म न ले ले अगर यूँँ ही इस पे सिलवटों से भरी रज़ाई पड़ी रहेगी मिरी मोहब्बत के तीन दर्जे हैं सहल मुश्किल या ग़ैर-मुमकिन तो एक हिस्सा ही झेल पाएगी दो तिहाई पड़ी रहेगी
Amir Ameer
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इश्क़ मैं ने लिख डाला क़ौमीयत के ख़ाने में और तेरा दिल लिखा शहरियत के ख़ाने में मुझ को तजरबों ने ही बाप बन के पाला है सोचता हूँ क्या लिखूँ वलदियत के ख़ाने में मेरा साथ देती है मेरे साथ रहती है मैं ने लिखा तन्हाई ज़ाैजियत के ख़ाने में दोस्तों से जा कर जब मशवरा किया तो फिर मैं ने कुछ नहीं लिखा हैसियत के ख़ाने में इम्तिहाँ मोहब्बत का पास कर लिया मैं ने अब यही मैं लिखूँगा अहलियत के ख़ाने में जब से आप मेरे हैं फ़ख़्र से मैं लिखता हूँ नाम आप का अपनी मिलकियत के ख़ाने में
Amir Ameer
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तुझ को अपना के भी अपना नहीं होने देना ज़ख़्म-ए-दिल को कभी अच्छा नहीं होने देना मैं तो दुश्मन को भी मुश्किल में कुमक भेजूँगा इतनी जल्दी उसे पसपा नहीं होने देना तू ने मेरा नहीं होना है तो फिर याद रहे मैं ने तुझ को भी किसी का नहीं होने देना तू ने कितनों को नचाया है इशारों पे मगर मैं ने ऐ इश्क़! ये मुजरा नहीं होने देना उस ने खाई है क़सम फिर से मुझे भूलने की मैं ने इस बार भी ऐसा नहीं होने देना ज़िंदगी में तो तुझे छोड़ ही देता लेकिन फिर ये सोचा तुझे बेवा नहीं होने देना मज़हब-ए-इश्क़ कोई छोड़ मरे तो मैं ने ऐसे मुर्तद का जनाज़ा नहीं होने देना
Amir Ameer
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