ghazalKuch Alfaaz

इश्क़ मैं ने लिख डाला क़ौमीयत के ख़ाने में और तेरा दिल लिखा शहरियत के ख़ाने में मुझ को तजरबों ने ही बाप बन के पाला है सोचता हूँ क्या लिखूँ वलदियत के ख़ाने में मेरा साथ देती है मेरे साथ रहती है मैं ने लिखा तन्हाई ज़ाैजियत के ख़ाने में दोस्तों से जा कर जब मशवरा किया तो फिर मैं ने कुछ नहीं लिखा हैसियत के ख़ाने में इम्तिहाँ मोहब्बत का पास कर लिया मैं ने अब यही मैं लिखूँगा अहलियत के ख़ाने में जब से आप मेरे हैं फ़ख़्र से मैं लिखता हूँ नाम आप का अपनी मिलकियत के ख़ाने में

Amir Ameer4 Likes

Related Ghazal

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

More from Amir Ameer

ये मेरा अक्स जो ठहरा तिरी निगाह में है नहीं है प्यार तो फिर क्या तिरी सलाह में है नहीं है वक़्त की जुरअत कि छू सके उस को ये तेरा हुस्न कि जब तक मिरी पनाह में है नज़र जो तुझ पे रुके तो ज़रा नहीं सुनती कहाँ सवाब में है ये कहाँ गुनाह में है ज़बाँ सँभाल के अब नाम ले रक़ीब उस का जो तेरा प्यार था वो अब मिरे निकाह में है

Amir Ameer

5 likes

हुस्न तेरा ग़ुरूर मेरा था सच तो ये है क़ुसूर मेरा था रात यूँँ तेरे ख़्वाब से गुज़रा कि बदन चूर चूर मेरा था आइने में जमाल था तेरा तेरे चेहरे पे नूर मेरा था आँख की हर ज़बान पर कल तक बोलने में उबूर मेरा था उस की बातों में नाम मेरा न था ज़िक्र बैनस्सुतूर मेरा था एक ही वक़्त में जुनून-ओ-ख़िरद ला-शुऊ'र-ओ-शुऊ'र मेरा था

Amir Ameer

3 likes

प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था साँस उठाई उम्र समेटी चलने की तय्यारी की

Amir Ameer

4 likes

ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगी जो मैं भी रूठा तो सुब्ह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगन तो सोच ले कितनी सूनी सूनी तिरी कलाई पड़ी रहेगी हमारे घर से यूँँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँ मोहल्ले-भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगा वहीं पे इक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्मा हमारे घर में तो ऐसी बातों से ही लड़ाई पड़ी रहेगी और अब मिठाई की क्या ज़रूरत मैं तुझ से मिल-जुल के जा रहा हूँ मगर है अफ़्सोस तेरे हाथों की रस मलाई पड़ी रहेगी मुझे तो ऑफ़िस के आठ घंटों से होल आता है सोच कर ये हमारे माबैन रोज़ बरसों की ये जुदाई पड़ी रहेगी जो मेरी मानो तो मेरे ऑफ़िस मैं कोई मर्ज़ी की जॉब कर लो कि हम ने क्या काम-वाम करना है कारवाई पड़ी रहेगी हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रखेंगे रात सारी कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी इस एक बिस्तर पे आज कोई नई कहानी जन्म न ले ले अगर यूँँ ही इस पे सिलवटों से भरी रज़ाई पड़ी रहेगी मिरी मोहब्बत के तीन दर्जे हैं सहल मुश्किल या ग़ैर-मुमकिन तो एक हिस्सा ही झेल पाएगी दो तिहाई पड़ी रहेगी

Amir Ameer

7 likes

अगर ये कह दो बग़ैर मेरे नहीं गुज़ारा तो मैं तुम्हारा या उस पे मब्नी कोई तअस्सुर कोई इशारा तो मैं तुम्हारा ग़ुरूर-परवर अना का मालिक कुछ इस तरह के हैं नाम मेरे मगर क़सम से जो तुम ने इक नाम भी पुकारा तो मैं तुम्हारा तुम अपनी शर्तों पे खेल खेलो मैं जैसे चाहे लगाऊँ बाज़ी अगर मैं जीता तो तुम हो मेरे अगर मैं हारा तो मैं तुम्हारा तुम्हारा आशिक़ तुम्हारा मुख़्लिस तुम्हारा साथी तुम्हारा अपना रहा न इन में से कोई दुनिया में जब तुम्हारा तो मैं तुम्हारा तुम्हारा होने के फ़ैसले को मैं अपनी क़िस्मत पे छोड़ता हूँ अगर मुक़द्दर का कोई टूटा कभी सितारा तो मैं तुम्हारा ये किस पे ता'वीज़ कर रहे हो ये किस को पाने के हैं वज़ीफ़े तमाम छोड़ो बस एक कर लो जो इस्तिख़ारा तो मैं तुम्हारा

Amir Ameer

27 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Amir Ameer.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Amir Ameer's ghazal.