तुझ को अपना के भी अपना नहीं होने देना ज़ख़्म-ए-दिल को कभी अच्छा नहीं होने देना मैं तो दुश्मन को भी मुश्किल में कुमक भेजूँगा इतनी जल्दी उसे पसपा नहीं होने देना तू ने मेरा नहीं होना है तो फिर याद रहे मैं ने तुझ को भी किसी का नहीं होने देना तू ने कितनों को नचाया है इशारों पे मगर मैं ने ऐ इश्क़! ये मुजरा नहीं होने देना उस ने खाई है क़सम फिर से मुझे भूलने की मैं ने इस बार भी ऐसा नहीं होने देना ज़िंदगी में तो तुझे छोड़ ही देता लेकिन फिर ये सोचा तुझे बेवा नहीं होने देना मज़हब-ए-इश्क़ कोई छोड़ मरे तो मैं ने ऐसे मुर्तद का जनाज़ा नहीं होने देना
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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प्यार की हर इक रस्म कि जो मतरूक थी मैं ने जारी की इश्क़-लबादा तन पर पहना और मोहब्बत तारी की मैं अब शहर-ए-इश्क़ में कुछ क़ानून बनाने वाला हूँ अब उस उस की ख़ैर नहीं है जिस जिस ने ग़द्दारी की पहले थोड़ी बहुत मोहब्बत की कि कैसी होती है पर जब असली चेहरा देखा मैं ने तो फिर सारी की जो भी मुड़ कर देखेगा वो पत्थर का हो जाएगा देखो देखो शहर में आए सन्नाटा और तारीकी एक जन्म में मैं उस का था एक जन्म में वो मेरा हम ने की हर बार मोहब्बत लेकिन बारी बारी की हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की ऐसा प्यार था हम दोनों में कि बरसों ला-इल्म रहे उस ने भी किरदार निभाया मैं ने भी फ़नकारी की बात तो इतनी सी है वापस जाने को मैं आया था साँस उठाई उम्र समेटी चलने की तय्यारी की
Amir Ameer
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ये मेरा अक्स जो ठहरा तिरी निगाह में है नहीं है प्यार तो फिर क्या तिरी सलाह में है नहीं है वक़्त की जुरअत कि छू सके उस को ये तेरा हुस्न कि जब तक मिरी पनाह में है नज़र जो तुझ पे रुके तो ज़रा नहीं सुनती कहाँ सवाब में है ये कहाँ गुनाह में है ज़बाँ सँभाल के अब नाम ले रक़ीब उस का जो तेरा प्यार था वो अब मिरे निकाह में है
Amir Ameer
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इश्क़ मैं ने लिख डाला क़ौमीयत के ख़ाने में और तेरा दिल लिखा शहरियत के ख़ाने में मुझ को तजरबों ने ही बाप बन के पाला है सोचता हूँ क्या लिखूँ वलदियत के ख़ाने में मेरा साथ देती है मेरे साथ रहती है मैं ने लिखा तन्हाई ज़ाैजियत के ख़ाने में दोस्तों से जा कर जब मशवरा किया तो फिर मैं ने कुछ नहीं लिखा हैसियत के ख़ाने में इम्तिहाँ मोहब्बत का पास कर लिया मैं ने अब यही मैं लिखूँगा अहलियत के ख़ाने में जब से आप मेरे हैं फ़ख़्र से मैं लिखता हूँ नाम आप का अपनी मिलकियत के ख़ाने में
Amir Ameer
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ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगी जो मैं भी रूठा तो सुब्ह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगन तो सोच ले कितनी सूनी सूनी तिरी कलाई पड़ी रहेगी हमारे घर से यूँँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँ मोहल्ले-भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगा वहीं पे इक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्मा हमारे घर में तो ऐसी बातों से ही लड़ाई पड़ी रहेगी और अब मिठाई की क्या ज़रूरत मैं तुझ से मिल-जुल के जा रहा हूँ मगर है अफ़्सोस तेरे हाथों की रस मलाई पड़ी रहेगी मुझे तो ऑफ़िस के आठ घंटों से होल आता है सोच कर ये हमारे माबैन रोज़ बरसों की ये जुदाई पड़ी रहेगी जो मेरी मानो तो मेरे ऑफ़िस मैं कोई मर्ज़ी की जॉब कर लो कि हम ने क्या काम-वाम करना है कारवाई पड़ी रहेगी हमारे सपने कुछ इस तरह से जगाए रखेंगे रात सारी कि दिन चढ़े तक तो मेरी बाहोँ में कसमसाई पड़ी रहेगी इस एक बिस्तर पे आज कोई नई कहानी जन्म न ले ले अगर यूँँ ही इस पे सिलवटों से भरी रज़ाई पड़ी रहेगी मिरी मोहब्बत के तीन दर्जे हैं सहल मुश्किल या ग़ैर-मुमकिन तो एक हिस्सा ही झेल पाएगी दो तिहाई पड़ी रहेगी
Amir Ameer
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वो रूठी रूठी ये कह रही थी क़रीब आओ मुझे मनाओ हो मर्द तो आगे बढ़ के मुझ को गले लगाओ मुझे मनाओ मैं कल से नाराज़ हूँ क़सम से और एक कोने में जा पड़ी हूँ हाँ मैं ग़लत हूँ दिखाओ फिर भी तुम्हीं झुकाओ मुझे मनाओ तुम्हारे नख़रों से अपनी अन-बन तो बढ़ती जाएगी सुन रहे हो तुम एक सॉरी से ख़त्म कर सकते हो तनाव मुझे मनाओ तुम्हें पता भी है किस सखी से तुम्हारा पाला पड़ा हुआ है मुआ'फ़ कर दूँगी तुम को फ़ौरन ही आओ आओ मुझे मनाओ मुझे यूँँ अपने से दूर कर के न ख़ुश रहोगे ग़ुरूर कर के सो मुझ से कुछ फ़ासले पे रक्खो ये रख-रखाव मुझे मनाओ मुझे बताओ कि मेरी नाराज़गी से तुम को है फ़र्क़ कोई मैं खा रही हूँ न-जाने कब से ही पेच-ताव मुझे मनाओ मुझे पता है मुझे मनाने को तुम भी बेचैन हो रहे हो तो क्या ज़रूरी है तुम भी इतने भरम दिखाओ मुझे मनाओ मिरा इरादा तो पहले ही से है मान जाने का सच बताऊँ तुम अपने भर भी तमाम हर्बों को आज़माओ मुझे मनाओ बहुत बुरे हो मिरी दिखावे की नींद को भी तुम अस्ल समझे कहीं से सीखो पियार करना मुझे जगाओ मुझे मनाओ तुम अपने अंदाज़ में कि जैसे चढ़ा के रखते हो आस्तीनें तो मैं ''तुम्हारा'' रदीफ़ वाली ग़ज़ल सुनाओ मुझे मनाओ ख़िलाफ़-ए-मा'मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूँ कि फिर कभी मुझ से करते रहना ये भाव-ताव मुझे मनाओ मैं परले दर्जे का हट-धरम था कि फिर भी उस को मना न पाया सो अब भी कानों में गूँजता है मुझे मनाओ मुझे मनाओ
Amir Ameer
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