इसी नदामत से उस के कंधे झुके हुए हैं कि हम छड़ी का सहारा ले कर खड़े हुए हैं यहाँ से जाने की जल्दी किस को है तुम बताओ कि सूटकेसों में कपड़े किस ने रखे हुए हैं करा तो लूँगा इलाक़ा ख़ाली मैं लड़-झगड़ कर मगर जो उस ने दिलों पे क़ब्ज़े किए हुए हैं वो ख़ुद परिंदों का दाना लेने गया हुआ है और उस के बेटे शिकार करने गए हुए हैं तुम्हारे दिल में खुली दुकानों से लग रहा है ये घर यहाँ पर बहुत पुराने बने हुए हैं मैं कैसे बावर कराऊँ जा कर ये रौशनी को कि इन चराग़ों पे मेरे पैसे लगे हुए हैं तुम्हारी दुनिया में कितना मुश्किल है बच के चलना क़दम क़दम पर तो आस्ताने बने हुए हैं तुम इन को चाहो तो छोड़ सकते हो रास्ते में ये लोग वैसे भी ज़िंदगी से कटे हुए हैं
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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हमारे साथ कोई मसअला फुरात का है वगरना इल्म उसे अपनी मुश्किलात का है मेरे हिसाब से माज़ुरी हुस्न है मेरा अगर ये ऐब है तो भी ख़ुदा के हाथ का है इक आधे काम के ह़क़ में तो ख़ैर मैं भी हूँ तुम्हारे पास तो दफ़्तर शिफारिशात का है हमारी बात का जितना वसीअ पहलू है ज़बाँ पे लाने में नुक़सान काइनात का है हम उस के होने ना होने पे कितना लड़ रहे हैं किसी के वास्ते ये खेल नफ्सियात का है
Zia Mazkoor
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शाह से छुपके क़ैदी ने शहज़ादी को पैगाम लिखा जंग से भागने वालों में शहज़ादे का भी नाम लिखा दूरदराज़ से आने वाले ख़त मेरी हम सेाही के थे इक दिन उस ने हिम्मत कर के अपना असली नाम लिखा हम दोनों ने अपने अपने दीन पे क़ाएम रहना था घर की इक दीवार पे अल्लाह इक दीवार पे राम लिखा एक मोहब्बत ख़त्म हुई तो दूसरी की तैयारी की नई कहानी के आगाज में पहली का अंजाम लिखा
Zia Mazkoor
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ये बात सोच के तेरे हुए हैं हम दोनों के तुझ को ले के बहुत लड़ चुके हैं हम दोनों ये सरहदे तो अभी कल बनी है मेरे दोस्त हजारों साल इकट्ठे रहे हैं हम दोनों कोई तो था वो जो अब हाफ़िज़े का हिस्सा नहीं वो बात क्या थी जो भूले हुए हैं हम दोनों तुम ऐसी बात किसी को नहीं बताऊँगी मुझे लगा था बड़े हो चुके हैं हम दोनों हजारों जोड़े गुलाबों में छुप के बैठे हैं ये और बात के पकड़े गए हैैं हम दोनों
Zia Mazkoor
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किस तरह ईमान लाऊँ ख़्वाब की ता'बीर पर छिपकली चढ़ते हुए देखी है उस तस्वीर पर उस ने ऐसी कोठरी में क़ैद रक्खा था हमें रौशनी आँखों पे पड़ती थी या फिर ज़ंजीर पर माएँ बेटों से ख़फ़ा हैं और बेटे माँओं से इश्क़ ग़ालिब आ गया है दूध की तासीर पर मैं उन्हीं आबादियों में जी रहा होता कहीं तुम अगर हँसते नहीं उस दिन मेरी तक़दीर पर
Zia Mazkoor
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इस सेे आप का दुख भी हो जाएगा अच्छा ख़ासा कम मुझ पर गुज़रे लम्हों में से कर दो बस एक लम्हा कम बड़े-बड़े शहरों में कोई कैसे किसी से प्यार करे जितने आमने सामने घर है उतना आना जाना कम उस के पिस्टल से एक गोली कम होने का मतलब है अपने शहर में उड़ने वाले गोल से एक परिंदा कम कल तो वो और उस की कश्ती बस जलने ही वाले थे दरिया उस पर काफी गरम था लेकिन आग से थोड़ा कम सदके जाऊँ उन चीज़ों पर जिन को उस के हाथ लगे अजब मैकेनिक था वो जिस ने तोड़ा ज़्यादा जोड़ा कम
Zia Mazkoor
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