जान दी किस के लिए हम ये बताएँ किस को कौन क्या भूल गया याद दिलाएँ किस को जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा है हम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस को रूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न था वो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को कौन देता है यहाँ ख़्वाब-ए-जुनूँ की ता'बीर ख़्वाब हम अपने सुनाएँ तो सुनाएँ किस को कोई पुरसान-ए-वफ़ा है न पशीमान-ए-जफ़ा ज़ख़्म हम अपने दिखाएँ तो दिखाएँ किस को चाक-ए-दिल चाक-ए-गरेबाँ तो नहीं हम-नफ़सो हम ये तस्वीर सर-ए-बज़्म दिखाएँ किस को कौन इस शहर में सुनता है फ़ुग़ान-ए-दुर्वेश अपनी आशुफ़्ता-बयानी से रुलाएँ किस को हो गया ख़ाक रह-ए-कू-ए-मलामत 'अख़्तर' राह पर लाएँ जो अहबाब तो लाएँ किस को
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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कोई मुझ से जुदा हुआ है अभी ज़िंदगी एक सानेहा है अभी नहीं मौक़ा ये पुर्सिश-ए-ग़म का देखिए दिल दुखा हुआ है अभी कल गुज़र जाए दिल पे क्या मालूम इश्क़ सादा सा वाक़िआ'' है अभी बात पहुँची है इक नज़र में कहाँ हम तो समझे थे इब्तिदा है अभी कितने नज़दीक आ गए हैं वो किस क़दर उन से फ़ासला है अभी सारी बातें ये ख़्वाब की सी हैं ज़िंदगी दूर की सदा है अभी दार पर खींचते हैं 'अख़्तर' को जुर्म ये है कि जी रहा है अभी
Akhtar Saeed Khan
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कभी ज़बाँ पे न आया कि आरज़ू क्या है ग़रीब दिल पे अजब हसरतों का साया है सबा ने जागती आँखों को चूम चूम लिया न जाने आख़िर-ए-शब इंतिज़ार किस का है ये किस की जल्वागरी काएनात है मेरी कि ख़ाक हो के भी दिल शोला-ए-तमन्ना है तिरी नज़र की बहार-आफ़रीनियाँ तस्लीम मगर ये दिल में जो काँटा सा इक खटकता है जहान-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र की उड़ा रही है हँसी ये ज़िंदगी जो सर-ए-रहगुज़र तमाशा है ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है यही रहा है बस इक दिल के ग़म-गुसारों में ठहर ठहर के जो आँसू पलक तक आता है ठहर गए ये कहाँ आ के रोज़ ओ शब 'अख़्तर' कि आफ़्ताब है सर पर मगर अँधेरा है
Akhtar Saeed Khan
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फिरती है ज़िंदगी जनाज़ा-ब-दोश बुत भी चुप हैं ख़ुदा भी है ख़ामोश कोई मेरी तरह जिए तो सही ज़िंदगी दर-गुलू अजल बर-दोश दीदनी थी ये काएनात बहुत हम भी कुछ दिन रहे ख़राब-ए-होश घर से तौफ़-ए-हरम को निकला था राह में थी दुकान-ए-बादा-फ़रोश इक तअ'ल्लुक़ क़दम को राह से है मैं न आवारा हूँ न ख़ाना-ब-दोश हम से ग़ाफ़िल नहीं हैं अहल-ए-सितम इक ज़रा थक के हो गए हैं ख़मोश जी में है कोई आरज़ू कीजे या'नी बाक़ी है सर में मस्ती होश है ये दुनिया बहुत वसीअ' तो हो मैं हूँ और तेरा हल्का-ए-आग़ोश दिल को रोते कहाँ तलक 'अख़्तर' आख़िर-कार हो गए ख़ामोश
Akhtar Saeed Khan
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सफ़र ही शर्त-ए-सफ़र है तो ख़त्म क्या होगा तुम्हारे घर से उधर भी ये रास्ता होगा ज़माना सख़्त गिराँ ख़्वाब है मगर ऐ दिल पुकार तो सही कोई तो जागता होगा ये बे-सबब नहीं आए हैं आँख में आँसू ख़ुशी का लम्हा कोई याद आ गया होगा मिरा फ़साना हर इक दिल का माजरा तो न था सुना भी होगा किसी ने तो क्या सुना होगा फिर आज शाम से पैकार जान ओ तन में है फिर आज दिल ने किसी को भुला दिया होगा विदा कर मुझे ऐ ज़िंदगी गले मिल के फिर ऐसा दोस्त न तुझ से कभी जुदा होगा मैं ख़ुद से दूर हुआ जा रहा हूँ फिर 'अख़्तर' वो फिर क़रीब से हो कर गुज़र गया होगा
Akhtar Saeed Khan
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मैं ने माना एक न इक दिन लौट के तू आ जाएगा लेकिन तुझ बिन उम्र जो गुज़री कौन उसे लौटाएगा हिज्र के सद में उस का तग़ाफ़ुल बातें हैं सब कहने की कुछ भी न मुझ को याद रहेगा जब वो गले लग जाएगा ख़्वाब-ए-वफ़ा आँखों में बसाए फिरता है क्या दीवाने ताबीरें पथराव करेंगी जब तू ख़्वाब सुनाएगा कितनी यादें कितने क़िस्से नक़्श हैं इन दीवारों पर चलते चलते देख लें मुड़ कर कौन यहाँ फिर आएगा बाद-ए-बहारी इतना बता दे सादा-दिलान-ए-मौसम को सर्फ़-ए-चमन जो ख़ून हुआ है रंग वो कब तक लाएगा
Akhtar Saeed Khan
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