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सफ़र ही शर्त-ए-सफ़र है तो ख़त्म क्या होगा तुम्हारे घर से उधर भी ये रास्ता होगा ज़माना सख़्त गिराँ ख़्वाब है मगर ऐ दिल पुकार तो सही कोई तो जागता होगा ये बे-सबब नहीं आए हैं आँख में आँसू ख़ुशी का लम्हा कोई याद आ गया होगा मिरा फ़साना हर इक दिल का माजरा तो न था सुना भी होगा किसी ने तो क्या सुना होगा फिर आज शाम से पैकार जान ओ तन में है फिर आज दिल ने किसी को भुला दिया होगा विदा कर मुझे ऐ ज़िंदगी गले मिल के फिर ऐसा दोस्त न तुझ से कभी जुदा होगा मैं ख़ुद से दूर हुआ जा रहा हूँ फिर 'अख़्तर' वो फिर क़रीब से हो कर गुज़र गया होगा

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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जान दी किस के लिए हम ये बताएँ किस को कौन क्या भूल गया याद दिलाएँ किस को जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा है हम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस को रूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न था वो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को कौन देता है यहाँ ख़्वाब-ए-जुनूँ की ता'बीर ख़्वाब हम अपने सुनाएँ तो सुनाएँ किस को कोई पुरसान-ए-वफ़ा है न पशीमान-ए-जफ़ा ज़ख़्म हम अपने दिखाएँ तो दिखाएँ किस को चाक-ए-दिल चाक-ए-गरेबाँ तो नहीं हम-नफ़सो हम ये तस्वीर सर-ए-बज़्म दिखाएँ किस को कौन इस शहर में सुनता है फ़ुग़ान-ए-दुर्वेश अपनी आशुफ़्ता-बयानी से रुलाएँ किस को हो गया ख़ाक रह-ए-कू-ए-मलामत 'अख़्तर' राह पर लाएँ जो अहबाब तो लाएँ किस को

Akhtar Saeed Khan

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कोई मुझ से जुदा हुआ है अभी ज़िंदगी एक सानेहा है अभी नहीं मौक़ा ये पुर्सिश-ए-ग़म का देखिए दिल दुखा हुआ है अभी कल गुज़र जाए दिल पे क्या मालूम इश्क़ सादा सा वाक़िआ'' है अभी बात पहुँची है इक नज़र में कहाँ हम तो समझे थे इब्तिदा है अभी कितने नज़दीक आ गए हैं वो किस क़दर उन से फ़ासला है अभी सारी बातें ये ख़्वाब की सी हैं ज़िंदगी दूर की सदा है अभी दार पर खींचते हैं 'अख़्तर' को जुर्म ये है कि जी रहा है अभी

Akhtar Saeed Khan

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फिरती है ज़िंदगी जनाज़ा-ब-दोश बुत भी चुप हैं ख़ुदा भी है ख़ामोश कोई मेरी तरह जिए तो सही ज़िंदगी दर-गुलू अजल बर-दोश दीदनी थी ये काएनात बहुत हम भी कुछ दिन रहे ख़राब-ए-होश घर से तौफ़-ए-हरम को निकला था राह में थी दुकान-ए-बादा-फ़रोश इक तअ'ल्लुक़ क़दम को राह से है मैं न आवारा हूँ न ख़ाना-ब-दोश हम से ग़ाफ़िल नहीं हैं अहल-ए-सितम इक ज़रा थक के हो गए हैं ख़मोश जी में है कोई आरज़ू कीजे या'नी बाक़ी है सर में मस्ती होश है ये दुनिया बहुत वसीअ' तो हो मैं हूँ और तेरा हल्का-ए-आग़ोश दिल को रोते कहाँ तलक 'अख़्तर' आख़िर-कार हो गए ख़ामोश

Akhtar Saeed Khan

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यक़ीन है न गुमाँ है ज़रा सँभल के चलो अजीब रंग-ए-जहाँ है ज़रा सँभल के चलो सुलगते ख़्वाबों की बस्ती है रह-गुज़ार-ए-हयात यहाँ धुआँ ही धुआँ है ज़रा सँभल के चलो रविश रविश है गुज़र-गाह-ए-निकहत-ए-बर्बाद कली कली निगराँ है ज़रा सँभल के चलो जो ज़ख़्म दे के गई है अभी नसीम-ए-सहर सुकूत-ए-गुल से अयाँ है ज़रा सँभल के चलो ख़िराम-ए-नाज़ मुबारक तुम्हें मगर ये दिल मता-ए-शीशा-गराँ है ज़रा सँभल के चलो सुराग़-ए-हश्र न पा जाएँ देखने वाले हुजूम-ए-दीदा-वराँ है ज़रा सँभल के चलो यहाँ ज़मीन भी क़दमों के साथ चलती है ये आलम-ए-गुज़राँ है ज़रा सँभल के चलो

Akhtar Saeed Khan

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कभी ज़बाँ पे न आया कि आरज़ू क्या है ग़रीब दिल पे अजब हसरतों का साया है सबा ने जागती आँखों को चूम चूम लिया न जाने आख़िर-ए-शब इंतिज़ार किस का है ये किस की जल्वागरी काएनात है मेरी कि ख़ाक हो के भी दिल शोला-ए-तमन्ना है तिरी नज़र की बहार-आफ़रीनियाँ तस्लीम मगर ये दिल में जो काँटा सा इक खटकता है जहान-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र की उड़ा रही है हँसी ये ज़िंदगी जो सर-ए-रहगुज़र तमाशा है ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है यही रहा है बस इक दिल के ग़म-गुसारों में ठहर ठहर के जो आँसू पलक तक आता है ठहर गए ये कहाँ आ के रोज़ ओ शब 'अख़्तर' कि आफ़्ताब है सर पर मगर अँधेरा है

Akhtar Saeed Khan

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