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यक़ीन है न गुमाँ है ज़रा सँभल के चलो अजीब रंग-ए-जहाँ है ज़रा सँभल के चलो सुलगते ख़्वाबों की बस्ती है रह-गुज़ार-ए-हयात यहाँ धुआँ ही धुआँ है ज़रा सँभल के चलो रविश रविश है गुज़र-गाह-ए-निकहत-ए-बर्बाद कली कली निगराँ है ज़रा सँभल के चलो जो ज़ख़्म दे के गई है अभी नसीम-ए-सहर सुकूत-ए-गुल से अयाँ है ज़रा सँभल के चलो ख़िराम-ए-नाज़ मुबारक तुम्हें मगर ये दिल मता-ए-शीशा-गराँ है ज़रा सँभल के चलो सुराग़-ए-हश्र न पा जाएँ देखने वाले हुजूम-ए-दीदा-वराँ है ज़रा सँभल के चलो यहाँ ज़मीन भी क़दमों के साथ चलती है ये आलम-ए-गुज़राँ है ज़रा सँभल के चलो

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अब मजीद उस सेे ये रिश्ता नहीं रखा जाता जिस से इक शख़्स का परदा नहीं रखा जाता एक तो बस में नहीं तुझ से मुहब्बत न करूँ और फिर हाथ भी हल्का नहीं रखा जाता पढ़ने जाता हूँ तो तस्में नहीं बांदे जाते घर पलटता हूँ तो बस्ता नहीं रखा जाता दर-ओ-दीवार पे जंगल का गुमाँ होता है मुझ से अब घर में परिंदा नहीं रखा जाता

Tehzeeb Hafi

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उस के पहलू से लग के चलते हैं हम कहीं टालने से टलते हैं बंद है मय-कदों के दरवाज़े हम तो बस यूँँही चल निकलते हैं मैं उसी तरह तो बहलता हूँ और सब जिस तरह बहलते हैं वो है जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं है उसे दूर का सफ़र दर-पेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं शाम फ़ुर्क़त की लहलहा उठी वो हवा है कि ज़ख़्म भरते हैं है अजब फ़ैसले का सहरा भी चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद देखने वाले हाथ मलते हैं तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुशबू हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं

Jaun Elia

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तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के आते जाते हैं कई रंग मेरे चेहरे पर लोग लेते हैं मज़ा ज़िक्र तुम्हारा कर के एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के मुंतज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा कर के

Rahat Indori

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हम तो आपसे अच्छी बातें करते हैं आप ही हम से ऐसी बातें करते हैं मिलने पर चुप लग जाती है दोनों को फ़ोन पर अच्छी खासी बातें करते हैं लोग तो करते होंगे उस के बारे में पर जो शहर के दर्ज़ी बातें करते हैं बिन देखे ईमान नहीं ला सकता मैं और वो ग़ैर-यक़ीनी बातें करते हैं पीर फ़कीर तो चुप ही रहते हैं "मज़कूर" दुनियादार ही दीनी बातें करते हैं

Zia Mazkoor

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वही फिर मुझे याद आने लगे हैं जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं वो हैं पास और याद आने लगे हैं मोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं हटाए थे जो राह से दोस्तों की वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं हवाएँ चलीं और न मौजें ही उट्ठीं अब ऐसे भी तूफ़ान आने लगे हैं क़यामत यक़ीनन क़रीब आ गई है 'ख़ुमार' अब तो मस्जिद में जाने लगे हैं

Khumar Barabankvi

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कोई मुझ से जुदा हुआ है अभी ज़िंदगी एक सानेहा है अभी नहीं मौक़ा ये पुर्सिश-ए-ग़म का देखिए दिल दुखा हुआ है अभी कल गुज़र जाए दिल पे क्या मालूम इश्क़ सादा सा वाक़िआ'' है अभी बात पहुँची है इक नज़र में कहाँ हम तो समझे थे इब्तिदा है अभी कितने नज़दीक आ गए हैं वो किस क़दर उन से फ़ासला है अभी सारी बातें ये ख़्वाब की सी हैं ज़िंदगी दूर की सदा है अभी दार पर खींचते हैं 'अख़्तर' को जुर्म ये है कि जी रहा है अभी

Akhtar Saeed Khan

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जान दी किस के लिए हम ये बताएँ किस को कौन क्या भूल गया याद दिलाएँ किस को जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा है हम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस को रूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न था वो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को कौन देता है यहाँ ख़्वाब-ए-जुनूँ की ता'बीर ख़्वाब हम अपने सुनाएँ तो सुनाएँ किस को कोई पुरसान-ए-वफ़ा है न पशीमान-ए-जफ़ा ज़ख़्म हम अपने दिखाएँ तो दिखाएँ किस को चाक-ए-दिल चाक-ए-गरेबाँ तो नहीं हम-नफ़सो हम ये तस्वीर सर-ए-बज़्म दिखाएँ किस को कौन इस शहर में सुनता है फ़ुग़ान-ए-दुर्वेश अपनी आशुफ़्ता-बयानी से रुलाएँ किस को हो गया ख़ाक रह-ए-कू-ए-मलामत 'अख़्तर' राह पर लाएँ जो अहबाब तो लाएँ किस को

Akhtar Saeed Khan

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कभी ज़बाँ पे न आया कि आरज़ू क्या है ग़रीब दिल पे अजब हसरतों का साया है सबा ने जागती आँखों को चूम चूम लिया न जाने आख़िर-ए-शब इंतिज़ार किस का है ये किस की जल्वागरी काएनात है मेरी कि ख़ाक हो के भी दिल शोला-ए-तमन्ना है तिरी नज़र की बहार-आफ़रीनियाँ तस्लीम मगर ये दिल में जो काँटा सा इक खटकता है जहान-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र की उड़ा रही है हँसी ये ज़िंदगी जो सर-ए-रहगुज़र तमाशा है ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है यही रहा है बस इक दिल के ग़म-गुसारों में ठहर ठहर के जो आँसू पलक तक आता है ठहर गए ये कहाँ आ के रोज़ ओ शब 'अख़्तर' कि आफ़्ताब है सर पर मगर अँधेरा है

Akhtar Saeed Khan

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मैं ने माना एक न इक दिन लौट के तू आ जाएगा लेकिन तुझ बिन उम्र जो गुज़री कौन उसे लौटाएगा हिज्र के सद में उस का तग़ाफ़ुल बातें हैं सब कहने की कुछ भी न मुझ को याद रहेगा जब वो गले लग जाएगा ख़्वाब-ए-वफ़ा आँखों में बसाए फिरता है क्या दीवाने ताबीरें पथराव करेंगी जब तू ख़्वाब सुनाएगा कितनी यादें कितने क़िस्से नक़्श हैं इन दीवारों पर चलते चलते देख लें मुड़ कर कौन यहाँ फिर आएगा बाद-ए-बहारी इतना बता दे सादा-दिलान-ए-मौसम को सर्फ़-ए-चमन जो ख़ून हुआ है रंग वो कब तक लाएगा

Akhtar Saeed Khan

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दिल-ए-शोरीदा की वहशत नहीं देखी जाती रोज़ इक सर पे क़यामत नहीं देखी जाती अब उन आँखों में वो अगली सी निदामत भी नहीं अब दिल-ए-ज़ार की हालत नहीं देखी जाती बंद कर दे कोई माज़ी का दरीचा मुझ पर अब इस आईने में सूरत नहीं देखी जाती आप की रंजिश-ए-बेजा ही बहुत है मुझ को दिल पे हर ताज़ा मुसीबत नहीं देखी जाती तू कहानी ही के पर्दे में भली लगती है ज़िंदगी तेरी हक़ीक़त नहीं देखी जाती लफ़्ज़ उस शोख़ का मुँह देख के रह जाते हैं लब-ए-इज़हार की हसरत नहीं देखी जाती दुश्मन-ए-जाँ ही सही साथ तो इक उम्र का है दिल से अब दर्द की रुख़्सत नहीं देखी जाती देखा जाता है यहाँ हौसला-ए-क़ता-ए-सफ़र नफ़स-ए-चंद की मोहलत नहीं देखी जाती देखिए जब भी मिज़ा पर है इक आँसू 'अख़्तर' दीदा-ए-तर की रिफ़ाक़त नहीं देखी जाती

Akhtar Saeed Khan

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