जब तलक तेरा सहारा है मुझे गहरा पानी भी किनारा है मुझे आप मौजूद को रद्द करते हैं मेरा मतरूक भी प्यारा है मुझे न भी चमके तो कोई बात नहीं तू तो वैसे ही सितारा है मुझे मिल गई होगी ग़लत बस में नशिस्त जिस ने मंज़िल पे उतारा है मुझे कौन मानेगा मेरे क़ातिल ने बर्फ़ की नोख से मारा है मुझे
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था ताले की ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था कभी कभी आती थी पहले वस्ल की लज़्ज़त अंदर तक बारिश तिरछी पड़ती थी तो कमरा गीला होता था शुक्र करो तुम इस बस्ती में भी स्कूल खुला वर्ना मर जाने के बा'द किसी का सपना पूरा होता था जब तक माथा चूम के रुख़्सत करने वाली ज़िंदा थी दरवाज़े के बाहर तक भी मुँह में लुक़्मा होता था भले ज़माने थे जब शे'र सुहूलत से हो जाते थे नए सुख़न के नाम पे 'अज़हर' 'मीर' का चर्बा होता था
Azhar Faragh
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मोहब्बत का न दुनिया का न दीं का किसी का भी नहीं झूठा कहीं का अभी थी रास्ते में आशनाई स्टेशन आ गया उस महजबीं का किसी का पाँव चूमा हो तो समझो फ़लक से कम नहीं रुतबा ज़मीं का उसे साँपों से ख़ौफ आता है 'अज़हर' बटन लगवाऊँ कैसे आस्तीं का
Azhar Faragh
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कोई भी शक्ल मिरे दिल में उतर सकती है इक रिफ़ाक़त में कहाँ उम्र गुज़र सकती है तुझ से कुछ और तअल्लुक़ भी ज़रूरी है मिरा ये मोहब्बत तो किसी वक़्त भी मर सकती है मेरी ख़्वाहिश है कि फूलों से तुझे फ़त्ह करूँँ वर्ना ये काम तो तलवार भी कर सकती है हो अगर मौज में हम जैसा कोई अंधा फ़क़ीर एक सिक्के से भी तक़दीर सँवर सकती है सुब्ह-दम सुर्ख़ उजाला है खुले पानी में चाँद की लाश कहीं से भी उभर सकती है
Azhar Faragh
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