ghazalKuch Alfaaz

दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था ताले की ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था कभी कभी आती थी पहले वस्ल की लज़्ज़त अंदर तक बारिश तिरछी पड़ती थी तो कमरा गीला होता था शुक्र करो तुम इस बस्ती में भी स्कूल खुला वर्ना मर जाने के बा'द किसी का सपना पूरा होता था जब तक माथा चूम के रुख़्सत करने वाली ज़िंदा थी दरवाज़े के बाहर तक भी मुँह में लुक़्मा होता था भले ज़माने थे जब शे'र सुहूलत से हो जाते थे नए सुख़न के नाम पे 'अज़हर' 'मीर' का चर्बा होता था

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अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़ सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे

Khalil Ur Rehman Qamar

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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो

Jawwad Sheikh

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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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अब नए सपने सजाना आप को शादी मुबारक रात दिन बस मुस्कुराना आप को शादी मुबारक याद करवाई थी मैं ने जो ग़ज़ल मेरी कभी वो हो सके तो भूल जाना आप को शादी मुबारक जानता हूँ मन करेगा बात करलें इक दफ़ा बस फ़ोन लेकिन मत लगाना आप को शादी मुबारक दूर अब माँ बाप से घर से हमेशा ही रहोगे वक़्त पर खा लेना खाना आप को शादी मुबारक आपसे ये इल्तिजा, मैं जब कभी टीवी पे आऊँ आप चैनल मत हटाना, आप को शादी मुबारक पूछ ले कोई सहेली क्या हुआ उस इश्क़ का तो दोष मुझ पर ही लगाना आप को शादी मुबारक आपने शादी रचाई तो मेरी उम्मीद टूटी शुक्रिया करता दीवाना आप को शादी मुबारक

Tanoj Dadhich

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मोहब्बत का न दुनिया का न दीं का किसी का भी नहीं झूठा कहीं का अभी थी रास्ते में आशनाई स्टेशन आ गया उस महजबीं का किसी का पाँव चूमा हो तो समझो फ़लक से कम नहीं रुतबा ज़मीं का उसे साँपों से ख़ौफ आता है 'अज़हर' बटन लगवाऊँ कैसे आस्तीं का

Azhar Faragh

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कोई भी शक्ल मिरे दिल में उतर सकती है इक रिफ़ाक़त में कहाँ उम्र गुज़र सकती है तुझ से कुछ और तअल्लुक़ भी ज़रूरी है मिरा ये मोहब्बत तो किसी वक़्त भी मर सकती है मेरी ख़्वाहिश है कि फूलों से तुझे फ़त्ह करूँँ वर्ना ये काम तो तलवार भी कर सकती है हो अगर मौज में हम जैसा कोई अंधा फ़क़ीर एक सिक्के से भी तक़दीर सँवर सकती है सुब्ह-दम सुर्ख़ उजाला है खुले पानी में चाँद की लाश कहीं से भी उभर सकती है

Azhar Faragh

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जब तलक तेरा सहारा है मुझे गहरा पानी भी किनारा है मुझे आप मौजूद को रद्द करते हैं मेरा मतरूक भी प्यारा है मुझे न भी चमके तो कोई बात नहीं तू तो वैसे ही सितारा है मुझे मिल गई होगी ग़लत बस में नशिस्त जिस ने मंज़िल पे उतारा है मुझे कौन मानेगा मेरे क़ातिल ने बर्फ़ की नोख से मारा है मुझे

Azhar Faragh

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