जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ वहीं डूबा हुआ पाया गया हूँ ब-हाल-ए-गुमरही पाया गया हूँ हरम से दैर में लाया गया हूँ बला काफ़ी न थी इक ज़िंदगी की दोबारा याद फ़रमाया गया हूँ ब-रंग-ए-लाला-ए-वीराना बेकार खिलाया और मुरझाया गया हूँ अगरचे अब्र-ए-गौहर-बार हूँ मैं मगर आँखों से बरसाया गया हूँ सुपुर्द-ए-ख़ाक ही करना था मुझ को तो फिर काहे को नहलाया गया हूँ फ़रिश्ते को न मैं शैतान समझा नतीजा ये कि बहकाया गया हूँ कोई सनअत नहीं मुझ में तो फिर क्यूँँ नुमाइश-गाह में लाया गया हूँ ब-क़ौल-ए-बरहमन क़हर-ए-ख़ुदा हूँ बुतों के हुस्न पर ढाया गया हूँ मुझे तो इस ख़बर ने खो दिया है सुना है मैं कहीं पाया गया हूँ 'हफ़ीज़' अहल-ए-ज़बाँ कब मानते थे बड़े ज़ोरों से मनवाया गया हूँ
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं
Hafeez Jalandhari
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आख़िर एक दिन शाद करोगे मेरा घर आबाद करोगे प्यार की बातें वस्ल की रातें याद करोगे याद करोगे किस दिल से आबाद किया था किस दिल से बर्बाद करोगे मैं ने अपनी क़ीमत कह दी तुम भी कुछ इरशाद करोगे ज़र के बंदो अक़्ल के अंधो तुम क्या मुझ को शाद करोगे जब मुझ को चुप लग जाएगी फिर तुम भी फ़रियाद करोगे और तुम्हें आता ही क्या है कोई सितम ईजाद करोगे तंग आ कर ऐ बंदा-परवर बंदे को आज़ाद करोगे मेरे दिल में बसने वालो तुम मुझ को बर्बाद करोगे हुस्न को रुस्वा कर के मरूँगा आख़िर तुम क्या याद करोगे हश्र के दिन उम्मीद है नासेह तुम मेरी इमदाद करोगे
Hafeez Jalandhari
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कोई चारा नहीं दुआ के सिवा कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा बर-सर-ए-साहिल मुराद यहाँ कोई उभरा है नाख़ुदा के सिवा कोई भी तो दिखाओ मंज़िल पर जिस को देखा हो रहनुमा के सिवा दिल सभी कुछ ज़बान पर लाया इक फ़क़त अर्ज़-ए-मुद्दआ के सिवा कोई राज़ी न रह सका मुझ से मेरे अल्लाह तिरी रज़ा के सिवा बुत-कदे से चले हो काबे को क्या मिलेगा तुम्हें ख़ुदा के सिवा दोस्तों के ये मुख़्लिसाना तीर कुछ नहीं मेरी ही ख़ता के सिवा मेहर ओ मह से बुलंद हो कर भी नज़र आया न कुछ ख़ला के सिवा ऐ 'हफ़ीज़' आह आह पर आख़िर क्या कहें दोस्त वाह वा के सिवा
Hafeez Jalandhari
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मजाज़ ऐन-ए-हक़ीक़त है बा-सफ़ा के लिए बुतों को देख रहा हूँ मगर ख़ुदा के लिए असर में हो गए क्यूँँ सात आसमाँ हाएल अभी तो हाथ उठे ही नहीं दुआ के लिए हुआ बस एक ही नाले में दम फ़ना अपना ये ताज़ियाना था उम्र-ए-गुरेज़-पा के लिए इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए हमें तो दावर-ए-महशर को छोड़ते ही बनी ख़ता-ए-इश्क़ न काफ़ी हुई सज़ा के लिए उसी को राह दिखाता हूँ जो मिटाए मुझे मैं हूँ तो नूर मगर चश्म-ए-नक़श-ए-पा के लिए ये जानता हूँ कि है निस्फ़ शब मगर साक़ी ज़रा सी चाहिए इक मर्द-ए-पारसा के लिए इलाही तेरे करम से मिले मय ओ माशूक़ अब इल्तिजा है बरसती हुई घटा के लिए 'हफ़ीज़' आज़िम-ए-काबा हुआ है जाने दो अब उस पे रहम करो ऐ बुतो ख़ुदा के लिए
Hafeez Jalandhari
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हुस्न ने सीखीं ग़रीब-आज़ारियाँ इश्क़ की मजबूरियाँ लाचारियाँ बह गया दिल हसरतों के ख़ून में ले गईं बीमार को बीमारियाँ सोच कर ग़म दीजिए ऐसा न हो आप को करनी पड़ें ग़म-ख़्वारियाँ दार के क़दमों में भी पहुँची न अक़्ल इश्क़ ही के सर रहीं सरदारियाँ इक तरफ़ जिंस-ए-वफ़ा क़ीमत-तबल इक तरफ़ मैं और मिरी नादारियाँ होते होते जान दूभर हो गई बढ़ते बढ़ते बढ़ गईं बे-ज़ारियाँ तुम ने दुनिया ही बदल डाली मिरी अब तो रहने दो ये दुनिया-दारियाँ
Hafeez Jalandhari
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