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आख़िर एक दिन शाद करोगे मेरा घर आबाद करोगे प्यार की बातें वस्ल की रातें याद करोगे याद करोगे किस दिल से आबाद किया था किस दिल से बर्बाद करोगे मैं ने अपनी क़ीमत कह दी तुम भी कुछ इरशाद करोगे ज़र के बंदो अक़्ल के अंधो तुम क्या मुझ को शाद करोगे जब मुझ को चुप लग जाएगी फिर तुम भी फ़रियाद करोगे और तुम्हें आता ही क्या है कोई सितम ईजाद करोगे तंग आ कर ऐ बंदा-परवर बंदे को आज़ाद करोगे मेरे दिल में बसने वालो तुम मुझ को बर्बाद करोगे हुस्न को रुस्वा कर के मरूँगा आख़िर तुम क्या याद करोगे हश्र के दिन उम्मीद है नासेह तुम मेरी इमदाद करोगे

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके ऐसा हो कोई नामा-बर बात पे कान धर सके सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके इज्ज़ से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज-ए-दोस्त अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल कौन तिरी तरह 'हफ़ीज़' दर्द के गीत गा सके

Hafeez Jalandhari

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कोई चारा नहीं दुआ के सिवा कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा बर-सर-ए-साहिल मुराद यहाँ कोई उभरा है नाख़ुदा के सिवा कोई भी तो दिखाओ मंज़िल पर जिस को देखा हो रहनुमा के सिवा दिल सभी कुछ ज़बान पर लाया इक फ़क़त अर्ज़-ए-मुद्दआ के सिवा कोई राज़ी न रह सका मुझ से मेरे अल्लाह तिरी रज़ा के सिवा बुत-कदे से चले हो काबे को क्या मिलेगा तुम्हें ख़ुदा के सिवा दोस्तों के ये मुख़्लिसाना तीर कुछ नहीं मेरी ही ख़ता के सिवा मेहर ओ मह से बुलंद हो कर भी नज़र आया न कुछ ख़ला के सिवा ऐ 'हफ़ीज़' आह आह पर आख़िर क्या कहें दोस्त वाह वा के सिवा

Hafeez Jalandhari

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मजाज़ ऐन-ए-हक़ीक़त है बा-सफ़ा के लिए बुतों को देख रहा हूँ मगर ख़ुदा के लिए असर में हो गए क्यूँँ सात आसमाँ हाएल अभी तो हाथ उठे ही नहीं दुआ के लिए हुआ बस एक ही नाले में दम फ़ना अपना ये ताज़ियाना था उम्र-ए-गुरेज़-पा के लिए इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए हमें तो दावर-ए-महशर को छोड़ते ही बनी ख़ता-ए-इश्क़ न काफ़ी हुई सज़ा के लिए उसी को राह दिखाता हूँ जो मिटाए मुझे मैं हूँ तो नूर मगर चश्म-ए-नक़श-ए-पा के लिए ये जानता हूँ कि है निस्फ़ शब मगर साक़ी ज़रा सी चाहिए इक मर्द-ए-पारसा के लिए इलाही तेरे करम से मिले मय ओ माशूक़ अब इल्तिजा है बरसती हुई घटा के लिए 'हफ़ीज़' आज़िम-ए-काबा हुआ है जाने दो अब उस पे रहम करो ऐ बुतो ख़ुदा के लिए

Hafeez Jalandhari

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मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं

Hafeez Jalandhari

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जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ वहीं डूबा हुआ पाया गया हूँ ब-हाल-ए-गुमरही पाया गया हूँ हरम से दैर में लाया गया हूँ बला काफ़ी न थी इक ज़िंदगी की दोबारा याद फ़रमाया गया हूँ ब-रंग-ए-लाला-ए-वीराना बेकार खिलाया और मुरझाया गया हूँ अगरचे अब्र-ए-गौहर-बार हूँ मैं मगर आँखों से बरसाया गया हूँ सुपुर्द-ए-ख़ाक ही करना था मुझ को तो फिर काहे को नहलाया गया हूँ फ़रिश्ते को न मैं शैतान समझा नतीजा ये कि बहकाया गया हूँ कोई सनअत नहीं मुझ में तो फिर क्यूँँ नुमाइश-गाह में लाया गया हूँ ब-क़ौल-ए-बरहमन क़हर-ए-ख़ुदा हूँ बुतों के हुस्न पर ढाया गया हूँ मुझे तो इस ख़बर ने खो दिया है सुना है मैं कहीं पाया गया हूँ 'हफ़ीज़' अहल-ए-ज़बाँ कब मानते थे बड़े ज़ोरों से मनवाया गया हूँ

Hafeez Jalandhari

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