मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
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पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा फ़रेब दे के तिरा जिस्म जीत लूँ लेकिन मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने 'सरवत' पर और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं
Tehzeeb Hafi
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हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके ऐसा हो कोई नामा-बर बात पे कान धर सके सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके इज्ज़ से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज-ए-दोस्त अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल कौन तिरी तरह 'हफ़ीज़' दर्द के गीत गा सके
Hafeez Jalandhari
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दोस्ती का चलन रहा ही नहीं अब ज़माने की वो हवा ही नहीं सच तो ये है सनम-कदे वालो दिल ख़ुदा ने तुम्हें दिया ही नहीं पलट आने से हो गया साबित नामा-बर तू वहाँ गया ही नहीं हाल ये है कि हम ग़रीबों का हाल तुम ने कभी सुना ही नहीं क्या चले ज़ोर दश्त-ए-वहशत का हम ने दामन कभी सिया ही नहीं ग़ैर भी एक दिन मरेंगे ज़रूर उन के हिस्से में क्या क़ज़ा ही नहीं उस की सूरत को देखता हूँ मैं मेरी सीरत वो देखता ही नहीं इश्क़ मेरा है शहर में मशहूर और तुम ने अभी सुना ही नहीं क़िस्सा-ए-क़ैस सुन के फ़रमाया झूट की कोई इंतिहा ही नहीं वास्ता किस का दें 'हफ़ीज़' उन को उन बुतों का कोई ख़ुदा ही नहीं
Hafeez Jalandhari
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ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है बात होती है मगर बात नहीं होती है बारयाबी का बुरा हो कि अब उन के दर पर अगले वक़्तों की मुदारात नहीं होती है ग़म तो घनघोर घटाओं की तरह उठते हैं ज़ब्त का दश्त है बरसात नहीं होती है ये मिरा तजरबा है हुस्न कोई चाल चले बाज़ी-ए-इश्क़ कभी मात नहीं होती है वस्ल है नाम हम-आहंगी ओ यक-रंगी का वस्ल में कोई बुरी बात नहीं होती है हिज्र तंहाई है सूरज है सवा नेज़े पर दिन ही रहता है यहाँ रात नहीं होती है ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं आज क्या बात है बरसात नहीं होती है मुझे अल्लाह की क़सम शे'र में तहसीन-ए-बुताँ मैं जो करता हूँ मेरी ज़ात नहीं होती है फ़िक्र-ए-तख़्लीक़-ए-सुख़न मसनद-ए-राहत पे हफ़ीज़ बाइस-ए-कश्फ़-ओ-करामात नहीं होती है
Hafeez Jalandhari
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आख़िर एक दिन शाद करोगे मेरा घर आबाद करोगे प्यार की बातें वस्ल की रातें याद करोगे याद करोगे किस दिल से आबाद किया था किस दिल से बर्बाद करोगे मैं ने अपनी क़ीमत कह दी तुम भी कुछ इरशाद करोगे ज़र के बंदो अक़्ल के अंधो तुम क्या मुझ को शाद करोगे जब मुझ को चुप लग जाएगी फिर तुम भी फ़रियाद करोगे और तुम्हें आता ही क्या है कोई सितम ईजाद करोगे तंग आ कर ऐ बंदा-परवर बंदे को आज़ाद करोगे मेरे दिल में बसने वालो तुम मुझ को बर्बाद करोगे हुस्न को रुस्वा कर के मरूँगा आख़िर तुम क्या याद करोगे हश्र के दिन उम्मीद है नासेह तुम मेरी इमदाद करोगे
Hafeez Jalandhari
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आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए मेरी पेशानी पे इक सज्दा तो है लिक्खा हुआ ये नहीं मालूम है किस आस्ताने के लिए उन का व'अदा और मुझे उस पर यक़ीं ऐ हम-नशीं इक बहाना है तड़पने तिलमिलाने के लिए जब से पहरा ज़ब्त का है आँसुओं की फ़स्ल पर हो गईं मुहताज आँखें दाने दाने के लिए आख़िरी उम्मीद वक़्त-ए-नज़अ उन की दीद थी मौत को भी मिल गया फ़िक़रा न आने के लिए अल्लाह अल्लाह दोस्त को मेरी तबाही पर ये नाज़ सू-ए-दुश्मन देखता है दाद पाने के लिए नेमत-ए-ग़म मेरा हिस्सा मुझ को दे दे ऐ ख़ुदा जम'अ रख मेरी ख़ुशी सारे ज़माने के लिए नुस्ख़ा-ए-हस्ती में इबरत के सिवा क्या था 'हफ़ीज़' सुर्ख़ियाँ कुछ मिल गईं अपने फ़साने के लिए
Hafeez Jalandhari
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