आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए मेरी पेशानी पे इक सज्दा तो है लिक्खा हुआ ये नहीं मालूम है किस आस्ताने के लिए उन का व'अदा और मुझे उस पर यक़ीं ऐ हम-नशीं इक बहाना है तड़पने तिलमिलाने के लिए जब से पहरा ज़ब्त का है आँसुओं की फ़स्ल पर हो गईं मुहताज आँखें दाने दाने के लिए आख़िरी उम्मीद वक़्त-ए-नज़अ उन की दीद थी मौत को भी मिल गया फ़िक़रा न आने के लिए अल्लाह अल्लाह दोस्त को मेरी तबाही पर ये नाज़ सू-ए-दुश्मन देखता है दाद पाने के लिए नेमत-ए-ग़म मेरा हिस्सा मुझ को दे दे ऐ ख़ुदा जम'अ रख मेरी ख़ुशी सारे ज़माने के लिए नुस्ख़ा-ए-हस्ती में इबरत के सिवा क्या था 'हफ़ीज़' सुर्ख़ियाँ कुछ मिल गईं अपने फ़साने के लिए
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो आदमी ही मुझे रहने दो ख़ुदा मत समझो ये जो मैं होश में रहता नहीं तुम सेे मिल कर ये मिरा इश्क़ है तुम इस को नशा मत समझो रास आता नहीं सब को ये मोहब्बत का मरज़ मेरी बीमारी को तुम अपनी दवा मत समझो
Shakeel Azmi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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हर अँधेरा रौशनी में लग गया जिस को देखो शा'इरी में लग गया हम को मर जाने की फ़ुर्सत कब मिली वक़्त सारा ज़िन्दगी में लग गया अपना मैख़ाना बना सकते थे हम इतना पैसा मैकशी में लग गया ख़ुद से इतनी दूर जा निकले थे हम इक ज़माना वापसी में लग गया
Mehshar Afridi
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हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके ऐसा हो कोई नामा-बर बात पे कान धर सके सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके इज्ज़ से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज-ए-दोस्त अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल कौन तिरी तरह 'हफ़ीज़' दर्द के गीत गा सके
Hafeez Jalandhari
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कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया चारागरों ने और भी दर्द दिल का बढ़ा दिया दोनों को दे के सूरतें साथ ही आइना दिया इश्क़ बिसोरने लगा हुस्न ने मुस्कुरा दिया ज़ौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा मुझ को बुतों से क्या मिला मुझ को ख़ुदा ने क्या दिया थी न ख़िज़ाँ की रोक-थाम दामन-ए-इख़्तियार में हम ने भरी बहार में अपना चमन लुटा दिया हुस्न-ए-नज़र की आबरू सनअत-ए-बरहमन से है जिस को सनम बना लिया उस को ख़ुदा बना दिया दाग़ है मुझ पे इश्क़ का मेरा गुनाह भी तो देख उस की निगाह भी तो देख जिस ने ये गुल खिला दिया इश्क़ की मम्लिकत में है शोरिश-ए-अक़्ल-ए-ना-मुराद उभरा कहीं जो ये फ़साद दिल ने वहीं दबा दिया नक़्श-ए-वफ़ा तो मैं ही था अब मुझे ढूँडते हो क्या हर्फ़-ए-ग़लत नज़र पड़ा तुम ने मुझे मिटा दिया ख़ुब्स-ए-दरूँ दिखा दिया हर दहन-ए-ग़लीज़ ने कुछ न कहा 'हफ़ीज़' ने हँस दिया मुस्कुरा दिया
Hafeez Jalandhari
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मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं
Hafeez Jalandhari
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दोस्ती का चलन रहा ही नहीं अब ज़माने की वो हवा ही नहीं सच तो ये है सनम-कदे वालो दिल ख़ुदा ने तुम्हें दिया ही नहीं पलट आने से हो गया साबित नामा-बर तू वहाँ गया ही नहीं हाल ये है कि हम ग़रीबों का हाल तुम ने कभी सुना ही नहीं क्या चले ज़ोर दश्त-ए-वहशत का हम ने दामन कभी सिया ही नहीं ग़ैर भी एक दिन मरेंगे ज़रूर उन के हिस्से में क्या क़ज़ा ही नहीं उस की सूरत को देखता हूँ मैं मेरी सीरत वो देखता ही नहीं इश्क़ मेरा है शहर में मशहूर और तुम ने अभी सुना ही नहीं क़िस्सा-ए-क़ैस सुन के फ़रमाया झूट की कोई इंतिहा ही नहीं वास्ता किस का दें 'हफ़ीज़' उन को उन बुतों का कोई ख़ुदा ही नहीं
Hafeez Jalandhari
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ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है बात होती है मगर बात नहीं होती है बारयाबी का बुरा हो कि अब उन के दर पर अगले वक़्तों की मुदारात नहीं होती है ग़म तो घनघोर घटाओं की तरह उठते हैं ज़ब्त का दश्त है बरसात नहीं होती है ये मिरा तजरबा है हुस्न कोई चाल चले बाज़ी-ए-इश्क़ कभी मात नहीं होती है वस्ल है नाम हम-आहंगी ओ यक-रंगी का वस्ल में कोई बुरी बात नहीं होती है हिज्र तंहाई है सूरज है सवा नेज़े पर दिन ही रहता है यहाँ रात नहीं होती है ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं आज क्या बात है बरसात नहीं होती है मुझे अल्लाह की क़सम शे'र में तहसीन-ए-बुताँ मैं जो करता हूँ मेरी ज़ात नहीं होती है फ़िक्र-ए-तख़्लीक़-ए-सुख़न मसनद-ए-राहत पे हफ़ीज़ बाइस-ए-कश्फ़-ओ-करामात नहीं होती है
Hafeez Jalandhari
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