ghazalKuch Alfaaz

ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है बात होती है मगर बात नहीं होती है बारयाबी का बुरा हो कि अब उन के दर पर अगले वक़्तों की मुदारात नहीं होती है ग़म तो घनघोर घटाओं की तरह उठते हैं ज़ब्त का दश्त है बरसात नहीं होती है ये मिरा तजरबा है हुस्न कोई चाल चले बाज़ी-ए-इश्क़ कभी मात नहीं होती है वस्ल है नाम हम-आहंगी ओ यक-रंगी का वस्ल में कोई बुरी बात नहीं होती है हिज्र तंहाई है सूरज है सवा नेज़े पर दिन ही रहता है यहाँ रात नहीं होती है ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं आज क्या बात है बरसात नहीं होती है मुझे अल्लाह की क़सम शे'र में तहसीन-ए-बुताँ मैं जो करता हूँ मेरी ज़ात नहीं होती है फ़िक्र-ए-तख़्लीक़-ए-सुख़न मसनद-ए-राहत पे हफ़ीज़ बाइस-ए-कश्फ़-ओ-करामात नहीं होती है

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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आख़िर एक दिन शाद करोगे मेरा घर आबाद करोगे प्यार की बातें वस्ल की रातें याद करोगे याद करोगे किस दिल से आबाद किया था किस दिल से बर्बाद करोगे मैं ने अपनी क़ीमत कह दी तुम भी कुछ इरशाद करोगे ज़र के बंदो अक़्ल के अंधो तुम क्या मुझ को शाद करोगे जब मुझ को चुप लग जाएगी फिर तुम भी फ़रियाद करोगे और तुम्हें आता ही क्या है कोई सितम ईजाद करोगे तंग आ कर ऐ बंदा-परवर बंदे को आज़ाद करोगे मेरे दिल में बसने वालो तुम मुझ को बर्बाद करोगे हुस्न को रुस्वा कर के मरूँगा आख़िर तुम क्या याद करोगे हश्र के दिन उम्मीद है नासेह तुम मेरी इमदाद करोगे

Hafeez Jalandhari

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मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं

Hafeez Jalandhari

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कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया चारागरों ने और भी दर्द दिल का बढ़ा दिया दोनों को दे के सूरतें साथ ही आइना दिया इश्क़ बिसोरने लगा हुस्न ने मुस्कुरा दिया ज़ौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा मुझ को बुतों से क्या मिला मुझ को ख़ुदा ने क्या दिया थी न ख़िज़ाँ की रोक-थाम दामन-ए-इख़्तियार में हम ने भरी बहार में अपना चमन लुटा दिया हुस्न-ए-नज़र की आबरू सनअत-ए-बरहमन से है जिस को सनम बना लिया उस को ख़ुदा बना दिया दाग़ है मुझ पे इश्क़ का मेरा गुनाह भी तो देख उस की निगाह भी तो देख जिस ने ये गुल खिला दिया इश्क़ की मम्लिकत में है शोरिश-ए-अक़्ल-ए-ना-मुराद उभरा कहीं जो ये फ़साद दिल ने वहीं दबा दिया नक़्श-ए-वफ़ा तो मैं ही था अब मुझे ढूँडते हो क्या हर्फ़-ए-ग़लत नज़र पड़ा तुम ने मुझे मिटा दिया ख़ुब्स-ए-दरूँ दिखा दिया हर दहन-ए-ग़लीज़ ने कुछ न कहा 'हफ़ीज़' ने हँस दिया मुस्कुरा दिया

Hafeez Jalandhari

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आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए मेरी पेशानी पे इक सज्दा तो है लिक्खा हुआ ये नहीं मालूम है किस आस्ताने के लिए उन का व'अदा और मुझे उस पर यक़ीं ऐ हम-नशीं इक बहाना है तड़पने तिलमिलाने के लिए जब से पहरा ज़ब्त का है आँसुओं की फ़स्ल पर हो गईं मुहताज आँखें दाने दाने के लिए आख़िरी उम्मीद वक़्त-ए-नज़अ उन की दीद थी मौत को भी मिल गया फ़िक़रा न आने के लिए अल्लाह अल्लाह दोस्त को मेरी तबाही पर ये नाज़ सू-ए-दुश्मन देखता है दाद पाने के लिए नेमत-ए-ग़म मेरा हिस्सा मुझ को दे दे ऐ ख़ुदा जम'अ रख मेरी ख़ुशी सारे ज़माने के लिए नुस्ख़ा-ए-हस्ती में इबरत के सिवा क्या था 'हफ़ीज़' सुर्ख़ियाँ कुछ मिल गईं अपने फ़साने के लिए

Hafeez Jalandhari

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कल ज़रूर आओगे लेकिन आज क्या करूँँ बढ़ रहा है क़ल्ब का इख़्तिलाज क्या करूँँ क्या करूँँ कोई नहीं एहतियाज दोस्त को और मुझ को दोस्त की एहतियाज क्या करूँँ अब वो फ़िक्रमंद हैं कह दिया तबीब ने इश्क़ है जुनूँ नहीं मैं इलाज क्या करूँँ ग़ैरत-ए-रक़ीब का शिकवा कर रहे हो तुम इस मुआमले में सख़्त है मिज़ाज क्या करूँँ मा-सिवा-ए-आशिक़ी और कुछ किया भी हो सूझता ही कुछ नहीं काम-काज क्या करूँँ महव-ए-कार-ए-दीं हूँ मैं बोरिया-नशीं हूँ मैं राहज़न नहीं हूँ मैं तख़्त-ओ-ताज क्या करूँँ ज़ोर और ज़र बग़ैर इश्क़ क्या करूँँ 'हफ़ीज़' चल गया है मुल्क में ये रिवाज क्या करूँँ

Hafeez Jalandhari

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