ghazalKuch Alfaaz

जैसी होनी हो वो रफ़्तार नहीं भी होती राह इस सम्त की हमवार नहीं भी होती मैं तही-दस्त लड़ाई के हुनर सीखता हूँ कभी इस हाथ में तलवार नहीं भी होती फिर भी हम लोग थे रस्मों में अक़ीदों में जुदा गर यहाँ बीच में दीवार नहीं भी होती वो मिरी ज़ात से इनकार किए रखता है गर कभी सूरत-ए-इंकार नहीं भी होती जिस को बेकार समझ कर किसी कोने में रखें ऐसा होता है कि बेकार नहीं भी होती दिल किसी बज़्म में जाते ही मचलता है 'ख़याल' सो तबीअत कहीं बे-ज़ार नहीं भी होती

Related Ghazal

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

235 likes

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

315 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

More from Ahmad Khayal

जिस समय तेरा असर था मुझ में बात करने का हुनर था मुझ में सुब्ह होते ही सभी ने देखा कोई ता हद्द-ए-नज़र था मुझ में माँ बताती है कि बचपन के समय किसी आसेब का डर था मुझ में जो भी आया कभी वापस न गया ऐसी चाहत का भँवर था मुझ में मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद' और सदियों का सफ़र था मुझ में

Ahmad Khayal

0 likes

उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका ज़माने को नई खिड़की से झाँका वो पूरा चाँद था लेकिन हमेशा गली में अध-खुली खिड़की से झाँका में पहली मर्तबा नश्शे में आया कोई जब दूसरी खिड़की से झाँका अमर होने की ख़्वाहिश मर गई थी जब इस ने दाइमी खिड़की से झाँका में सब्ज़े पर चला था नंगे पाँव सहर दम शबनमी खिड़की से झाँका मुझे भाते हैं लम्हे इख़तितामी में पहले आख़िरी खिड़की से झाँका

Ahmad Khayal

0 likes

ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक बुग़्ज़ की गर्द में लपटे हुए मेआ'र पे ख़ाक एक अर्से से मरी ज़ात में आबाद है दश्त एक अर्से से पड़ी है दर-ओ-दीवार पे ख़ाक वो ग़ज़ालों से अभी सीख के रम लौटा है बाल हैं धूल में गुम और लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक मुझे पलकों से सफ़ाई की सआदत हो नसीब डाल कर जाए हुआ रोज़ दर-ए-यार पे ख़ाक एक ख़ुत्बा जो दिया हज़रत-ए-ज़ैनब ने 'ख़याल' आज तक डाल रहा है किसी दरबार पे ख़ाक

Ahmad Khayal

0 likes

फ़ना के दश्त में कब का उतर गया था मैं तुम्हारा साथ न होता तो मर गया था मैं किसी के दस्त-ए-हुनर ने मुझे समेट लिया वगरना पात की सूरत बिखर गया था मैं वो ख़ुश-जमाल चमन से गुज़र के आया तो महक उठे थे गुलाब और निखर गया था मैं कोई तो दश्त समुंदर में ढल गया आख़िर किसी के हिज्र में रो रो के भर गया था मैं

Ahmad Khayal

0 likes

ये तअल्लुक़ तिरी पहचान बना सकता था तू मिरे साथ बहुत नाम कमा सकता था ये भी ए'जाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था मैं ने बाज़ार में इक बार ज़िया बाँटी थी मेरा किरदार मिरे हाथ कटा सकता था कुछ मसाइल मुझे घर रोक रहे हैं वर्ना मैं भी मजनूँ की तरह ख़ाक उड़ा सकता था अब तो तिनका मुझे शहतीर से भारी है 'ख़याल' मैं किसी वक़्त बहुत बोझ उठा सकता था

Ahmad Khayal

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ahmad Khayal.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ahmad Khayal's ghazal.