ghazalKuch Alfaaz

ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक बुग़्ज़ की गर्द में लपटे हुए मेआ'र पे ख़ाक एक अर्से से मरी ज़ात में आबाद है दश्त एक अर्से से पड़ी है दर-ओ-दीवार पे ख़ाक वो ग़ज़ालों से अभी सीख के रम लौटा है बाल हैं धूल में गुम और लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक मुझे पलकों से सफ़ाई की सआदत हो नसीब डाल कर जाए हुआ रोज़ दर-ए-यार पे ख़ाक एक ख़ुत्बा जो दिया हज़रत-ए-ज़ैनब ने 'ख़याल' आज तक डाल रहा है किसी दरबार पे ख़ाक

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं

Varun Anand

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शे'र ताज़ा कोई हुआ ही नहीं रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं याद है जो उसी को याद करो हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं

Fahmi Badayuni

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उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका ज़माने को नई खिड़की से झाँका वो पूरा चाँद था लेकिन हमेशा गली में अध-खुली खिड़की से झाँका में पहली मर्तबा नश्शे में आया कोई जब दूसरी खिड़की से झाँका अमर होने की ख़्वाहिश मर गई थी जब इस ने दाइमी खिड़की से झाँका में सब्ज़े पर चला था नंगे पाँव सहर दम शबनमी खिड़की से झाँका मुझे भाते हैं लम्हे इख़तितामी में पहले आख़िरी खिड़की से झाँका

Ahmad Khayal

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ये तअल्लुक़ तिरी पहचान बना सकता था तू मिरे साथ बहुत नाम कमा सकता था ये भी ए'जाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था मैं ने बाज़ार में इक बार ज़िया बाँटी थी मेरा किरदार मिरे हाथ कटा सकता था कुछ मसाइल मुझे घर रोक रहे हैं वर्ना मैं भी मजनूँ की तरह ख़ाक उड़ा सकता था अब तो तिनका मुझे शहतीर से भारी है 'ख़याल' मैं किसी वक़्त बहुत बोझ उठा सकता था

Ahmad Khayal

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जैसी होनी हो वो रफ़्तार नहीं भी होती राह इस सम्त की हमवार नहीं भी होती मैं तही-दस्त लड़ाई के हुनर सीखता हूँ कभी इस हाथ में तलवार नहीं भी होती फिर भी हम लोग थे रस्मों में अक़ीदों में जुदा गर यहाँ बीच में दीवार नहीं भी होती वो मिरी ज़ात से इनकार किए रखता है गर कभी सूरत-ए-इंकार नहीं भी होती जिस को बेकार समझ कर किसी कोने में रखें ऐसा होता है कि बेकार नहीं भी होती दिल किसी बज़्म में जाते ही मचलता है 'ख़याल' सो तबीअत कहीं बे-ज़ार नहीं भी होती

Ahmad Khayal

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मैं वहशत-ओ-जुनूँ में तमाशा नहीं बना सहरा मिरे वजूद का हिस्सा नहीं बना इस बार कूज़ा-गर की तवज्जोह थी और सम्त वर्ना हमारी ख़ाक से क्या क्या नहीं बना सोई हुई अना मिरे आड़े रही सदा कोशिश के बावजूद भी कासा नहीं बना ये भी तिरी शिकस्त नहीं है तो और क्या जैसा तू चाहता था मैं वैसा नहीं बना वर्ना हम ऐसे लोग कहाँ ठहरते यहाँ हम से फ़लक की सम्त का ज़ीना नहीं बना जितने कमाल-रंग थे सारे लिए गए फिर भी तिरे जमाल का नक़्शा नहीं बना रोका गया है वक़्त से पहले ही मेरा चाक मुझ को ये लग रहा है मैं पूरा नहीं बना

Ahmad Khayal

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जिस समय तेरा असर था मुझ में बात करने का हुनर था मुझ में सुब्ह होते ही सभी ने देखा कोई ता हद्द-ए-नज़र था मुझ में माँ बताती है कि बचपन के समय किसी आसेब का डर था मुझ में जो भी आया कभी वापस न गया ऐसी चाहत का भँवर था मुझ में मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद' और सदियों का सफ़र था मुझ में

Ahmad Khayal

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