उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका ज़माने को नई खिड़की से झाँका वो पूरा चाँद था लेकिन हमेशा गली में अध-खुली खिड़की से झाँका में पहली मर्तबा नश्शे में आया कोई जब दूसरी खिड़की से झाँका अमर होने की ख़्वाहिश मर गई थी जब इस ने दाइमी खिड़की से झाँका में सब्ज़े पर चला था नंगे पाँव सहर दम शबनमी खिड़की से झाँका मुझे भाते हैं लम्हे इख़तितामी में पहले आख़िरी खिड़की से झाँका
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
Tehzeeb Hafi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे उस सेे कहना कि वो इक बार दुबारा सोचे कैसे मुमकिन है उसे और कोई काम न हो कैसे मुमकिन है कि वो सिर्फ़ हमारा सोचे तेरे अफ़लाक पे जाए तो सितारा चमके मेरे अफ़लाक पे आए तो सितारा सोचे टूटे पतवार की कश्ती का मुक़द्दर क्या है ये तो दरिया ही बताए या किनारा सोचे ऐसा मौका हो कि बस एक ही बच सकता हो और उस वक़्त भी एक शख़्स तुम्हारा सोचे
Zahid Bashir
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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
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जैसी होनी हो वो रफ़्तार नहीं भी होती राह इस सम्त की हमवार नहीं भी होती मैं तही-दस्त लड़ाई के हुनर सीखता हूँ कभी इस हाथ में तलवार नहीं भी होती फिर भी हम लोग थे रस्मों में अक़ीदों में जुदा गर यहाँ बीच में दीवार नहीं भी होती वो मिरी ज़ात से इनकार किए रखता है गर कभी सूरत-ए-इंकार नहीं भी होती जिस को बेकार समझ कर किसी कोने में रखें ऐसा होता है कि बेकार नहीं भी होती दिल किसी बज़्म में जाते ही मचलता है 'ख़याल' सो तबीअत कहीं बे-ज़ार नहीं भी होती
Ahmad Khayal
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ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक बुग़्ज़ की गर्द में लपटे हुए मेआ'र पे ख़ाक एक अर्से से मरी ज़ात में आबाद है दश्त एक अर्से से पड़ी है दर-ओ-दीवार पे ख़ाक वो ग़ज़ालों से अभी सीख के रम लौटा है बाल हैं धूल में गुम और लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक मुझे पलकों से सफ़ाई की सआदत हो नसीब डाल कर जाए हुआ रोज़ दर-ए-यार पे ख़ाक एक ख़ुत्बा जो दिया हज़रत-ए-ज़ैनब ने 'ख़याल' आज तक डाल रहा है किसी दरबार पे ख़ाक
Ahmad Khayal
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जिस समय तेरा असर था मुझ में बात करने का हुनर था मुझ में सुब्ह होते ही सभी ने देखा कोई ता हद्द-ए-नज़र था मुझ में माँ बताती है कि बचपन के समय किसी आसेब का डर था मुझ में जो भी आया कभी वापस न गया ऐसी चाहत का भँवर था मुझ में मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद' और सदियों का सफ़र था मुझ में
Ahmad Khayal
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मैं वहशत-ओ-जुनूँ में तमाशा नहीं बना सहरा मिरे वजूद का हिस्सा नहीं बना इस बार कूज़ा-गर की तवज्जोह थी और सम्त वर्ना हमारी ख़ाक से क्या क्या नहीं बना सोई हुई अना मिरे आड़े रही सदा कोशिश के बावजूद भी कासा नहीं बना ये भी तिरी शिकस्त नहीं है तो और क्या जैसा तू चाहता था मैं वैसा नहीं बना वर्ना हम ऐसे लोग कहाँ ठहरते यहाँ हम से फ़लक की सम्त का ज़ीना नहीं बना जितने कमाल-रंग थे सारे लिए गए फिर भी तिरे जमाल का नक़्शा नहीं बना रोका गया है वक़्त से पहले ही मेरा चाक मुझ को ये लग रहा है मैं पूरा नहीं बना
Ahmad Khayal
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ये तअल्लुक़ तिरी पहचान बना सकता था तू मिरे साथ बहुत नाम कमा सकता था ये भी ए'जाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था मैं ने बाज़ार में इक बार ज़िया बाँटी थी मेरा किरदार मिरे हाथ कटा सकता था कुछ मसाइल मुझे घर रोक रहे हैं वर्ना मैं भी मजनूँ की तरह ख़ाक उड़ा सकता था अब तो तिनका मुझे शहतीर से भारी है 'ख़याल' मैं किसी वक़्त बहुत बोझ उठा सकता था
Ahmad Khayal
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