जिस्म क़ैद करती है वो जान छोड़ देती है मूल मूल रखती है लगान छोड़ देती है जान-ए-जाँ तुझे पता नहीं महाज़-ए-इश्क़ में बे-वफ़ाई होंठ पर निशान छोड़ देती है कैसे हम परिंदों को शिकारी का पता लगे तीर छोड़ते ही वो कमान छोड़ देती है
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
Tehzeeb Hafi
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए जो मेरे दिल से निकला है दु'आओं से निकल जाए हम ऐसे लोग जो दुश्मन के रोने पर ठहर जाएँ वो ऐसा शख़्स जो अपनों की लाशों से निकल जाए पढ़ाने का अगर मतलब है हाथों से निकल जाना ख़ुदाया फिर मिरी बेटी भी हाथों से निकल जाए वही इक शख़्स था मेरा यहाँ पर जी लगाने को उसी को चाहते थे सब कि गाँव से निकल जाए इधर तो छू रही है जिस्म मेरा ठंडे हाथों से उधर वो चाहती है रात बातों से निकल जाए नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए
Kushal Dauneria
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हुस्न इक गुलसिताँ का माली है आँख शहतूत बदन डाली है मैं ने कुछ देर उदासी हँस कर मारी है मार नहीं डाली है साज-ओ-श्रृंगार से चमकाया बदन एक ही नोट वो भी जाली है
Kushal Dauneria
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वो जब बंद कमरे में लटका हुआ था ये किस को पता था खिलाड़ी मोहब्बत में बिल्कुल नया था ये किस को पता था कि उन जाहिलों ने उसे आदमी की तरह भी न रक्खा मैं बचपन से जिस शख़्स को पूजता था ये किस को पता था मैं जब तक उसे जीत लेने की तैयारियाँ कर रहा था वो तब तक किसी और का हो चुका था ये किस को पता था
Kushal Dauneria
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आए दिन मुझ सेे ख़फ़ा रहता है दिल को इक डर सा लगा रहता है सारा दिन प्यार करेगा मुझ सेे जैसे तू घर पे बड़ा रहता है सब सेे कहती है तुम्हारा शाइ'र मेरे पहलू में पड़ा रहता है इश्क़ वो खेल है जिस में हर वक़्त जान का ख़तरा बना रहता है
Kushal Dauneria
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जिस शाम उस को ट्रेन में बैठा के आया था मैं उस को उस के प्यार से मिलवा के आया था उस की बसी बसाई मैं दुनिया उजाड़ कर जो खा नहीं सका उसे फैला के आया था मेरे नसीब में कहीं बैठा तुम्हारा दुख लगता था जैसे माँ की क़सम खा के आया था
Kushal Dauneria
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