ghazalKuch Alfaaz

jo ab bhi na taklif farmaiyega to bas haath malte hi rah jaiyega nigahon se chhup kar kahan jaiyega jahan jaiyega hamen paiyega mira jab bura haal sun paiyega khiraman khiraman chale aiyega mita kar hamen aap pachhtaiyega kami koi mahsus farmaiyega nahin khel naseh junun ki haqiqat samajh lijiyega to samjhaiyega hamen bhi ye ab dekhna hai ki ham par kahan tak tavajjoh na farmaiyega sitam 'ishq men aap asan na samjhen tadap jaiyega jo tadpaiyega ye dil hai ise dil hi bas rahne diije karam kijiyega to pachhtaiyega kahin chup rahi hai zaban-e-mohabbat na farmaiyega to farmaiyega bhulana hamara mubarak mubarak magar shart ye hai na yaad aiyega hamen bhi na ab chain aaega jab tak in ankhon men aansu na bhar laiyega tira jazba-e-shauq hai be-haqiqat zara phir to irshad farmaiyega hamin jab na honge to kya rang-e-mahfil kise dekh kar aap sharmaiyega ye maana ki de kar hamen ranj-e-furqat mudava-e-furqat na farmaiyega mohabbat mohabbat hi rahti hai lekin kahan tak tabi'at ko behlaiyega na hoga hamara hi aghhosh khali kuchh apna bhi pahlu tahi paiyega junun ki 'jigar' koi had bhi hai akhir kahan tak kisi par sitam dhaiyega jo ab bhi na taklif farmaiyega to bas hath malte hi rah jaiyega nigahon se chhup kar kahan jaiyega jahan jaiyega hamein paiyega mera jab bura haal sun paiyega khiraman khiraman chale aaiyega mita kar hamein aap pachhtaiyega kami koi mahsus farmaiyega nahin khel naseh junun ki haqiqat samajh lijiyega to samjhaiyega hamein bhi ye ab dekhna hai ki hum par kahan tak tawajjoh na farmaiyega sitam 'ishq mein aap aasan na samjhen tadap jaiyega jo tadpaiyega ye dil hai ise dil hi bas rahne dije karam kijiyega to pachhtaiyega kahin chup rahi hai zaban-e-mohabbat na farmaiyega to farmaiyega bhulana hamara mubarak mubarak magar shart ye hai na yaad aaiyega hamein bhi na ab chain aaega jab tak in aankhon mein aansu na bhar laiyega tera jazba-e-shauq hai be-haqiqat zara phir to irshad farmaiyega hamin jab na honge to kya rang-e-mahfil kise dekh kar aap sharmaiyega ye mana ki de kar hamein ranj-e-furqat mudawa-e-furqat na farmaiyega mohabbat mohabbat hi rahti hai lekin kahan tak tabi'at ko behlaiyega na hoga hamara hi aaghosh khali kuchh apna bhi pahlu tahi paiyega junun ki 'jigar' koi had bhi hai aakhir kahan tak kisi par sitam dhaiyega

Related Ghazal

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

More from Jigar Moradabadi

किया तअज्जुब कि मिरी रूह-ए-रवाँ तक पहुँचे पहले कोई मिरे नग़्मों की ज़बाँ तक पहुँचे जब हर इक शोरिश-ए-ग़म ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे फिर ख़ुदा जाने ये हंगामा कहाँ तक पहुँचे आँख तक दिल से न आए न ज़बाँ तक पहुँचे बात जिस की है उसी आफ़त-ए-जाँ तक पहुँचे तू जहाँ पर था बहुत पहले वहीं आज भी है देख रिंदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ास कहाँ तक पहुँचे जो ज़माने को बुरा कहते हैं ख़ुद हैं वो बुरे काश ये बात तिरे गोश-ए-गिराँ तक पहुँचे बढ़ के रिंदों ने क़दम हज़रत-ए-वाइज़ के लिए गिरते पड़ते जो दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे तू मिरे हाल-ए-परेशाँ पे बहुत तंज़ न कर अपने गेसू भी ज़रा देख कहाँ तक पहुँचे उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे इश्क़ की चोट दिखाने में कहीं आती है कुछ इशारे थे कि जो लफ़्ज़-ओ-बयाँ तक पहुँचे जल्वे बेताब थे जो पर्दा-ए-फ़ितरत में 'जिगर' ख़ुद तड़प कर मिरी चश्म-ए-निगराँ तक पहुँचे

Jigar Moradabadi

1 likes

बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं ख़ाली है शीशा और पिए जा रहा हूँ मैं पैहम जो आह आह किए जा रहा हूँ मैं दौलत है ग़म ज़कात दिए जा रहा हूँ मैं मजबूरी-ए-कमाल-ए-मोहब्बत तो देखना जीना नहीं क़ुबूल जिए जा रहा हूँ मैं वो दिल कहाँ है अब कि जिसे प्यार कीजिए मजबूरियाँ हैं साथ दिए जा रहा हूँ मैं रुख़्सत हुई शबाब के हमराह ज़िंदगी कहने की बात है कि जिए जा रहा हूँ मैं पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूँ मैं

Jigar Moradabadi

1 likes

इश्क़ को बे-नक़ाब होना था आप अपना जवाब होना था मस्त-ए-जाम-ए-शराब होना था बे-ख़ुद-ए-इज़्तिराब होना था तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं हाँ मुझी को ख़राब होना था आओ मिल जाओ मुस्कुरा के गले हो चुका जो इताब होना था कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया जिस को ख़ाना-ख़राब होना था मस्त-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक होते ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब होना था दिल कि जिस पर हैं नक़्श-ए-रंगा-रंग उस को सादा किताब होना था हम ने नाकामियों को ढूँड लिया आख़िरश कामयाब होना था हाए वो लम्हा-ए-सुकूँ कि जिसे महशर-ए-इज़्तिराब होना था निगह-ए-यार ख़ुद तड़प उठती शर्त-ए-अव्वल ख़राब होना था क्यूँँ न होता सितम भी बे-पायाँ करम-ए-बे-हिसाब होना था क्यूँँ नज़र हैरतों में डूब गई मौज-ए-सद-इज़्तिराब होना था हो चुका रोज़-ए-अव्वलीं ही 'जिगर' जिस को जितना ख़राब होना था

Jigar Moradabadi

1 likes

सभी अंदाज़-ए-हुस्न प्यारे हैं हम मगर सादगी के मारे हैं उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे हैं ऐ सहारों की ज़िंदगी वालो कितने इंसान बे-सहारे हैं लाला-ओ-गुल से तुझ को क्या निस्बत ना-मुकम्मल से इस्तिआ'रे हैं हम तो अब डूब कर ही उभरेंगे वो रहें शाद जो किनारे हैं शब-ए-फ़ुर्क़त भी जगमगा उट्ठी अश्क-ए-ग़म हैं कि माह-पारे हैं आतिश-ए-इश्क़ वो जहन्नम है जिस में फ़िरदौस के नज़ारे हैं वो हमीं हैं कि जिन के हाथों ने गेसू-ए-ज़िंदगी सँवारे हैं हुस्न की बे-नियाज़ियों पे न जा बे-इशारे भी कुछ इशारे हैं

Jigar Moradabadi

4 likes

वो जो रूठें यूँँ मनाना चाहिए ज़िंदगी से रूठ जाना चाहिए हिम्मत-ए-क़ातिल बढ़ाना चाहिए ज़ेर-ए-ख़ंजर मुस्कुराना चाहिए ज़िंदगी है नाम ज़ोहद ओ जंग का मौत क्या है भूल जाना चाहिए है इन्हीं धोकों से दिल की ज़िंदगी जो हसीं धोका हो खाना चाहिए लज़्ज़तें हैं दुश्मन-ए-औज-ए-कमाल कुल्फ़तों से जी लगाना चाहिए उन से मिलने को तो क्या कहिए 'जिगर' ख़ुद से मिलने को ज़माना चाहिए

Jigar Moradabadi

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Jigar Moradabadi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Jigar Moradabadi's ghazal.