ghazalKuch Alfaaz

जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है मगर वो आज भी बरहम नहीं है बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है तक़ाज़े क्यूँँ करूँँ पैहम न साक़ी किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है 'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़िरद की इता'अत ज़रूरी सही यही तो जुनूँ का ज़माना भी है न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़' ज़माने को आगे बढ़ाना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है

Asrar Ul Haq Majaz

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जिगर और दिल को बचाना भी है नज़र आप ही से मिलाना भी है मोहब्बत का हर भेद पाना भी है मगर अपना दामन बचाना भी है जो दिल तेरे ग़म का निशाना भी है क़तील-ए-जफ़ा-ए-ज़माना भी है ये बिजली चमकती है क्यूँँ दम-ब-दम चमन में कोई आशियाना भी है ख़िरद की इता'अत ज़रूरी सही यही तो जुनूँ का ज़माना भी है न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़' ज़माने को आगे बढ़ाना भी है

Asrar Ul Haq Majaz

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