ख़िरद की इता'अत ज़रूरी सही यही तो जुनूँ का ज़माना भी है न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़' ज़माने को आगे बढ़ाना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है
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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है
Tehzeeb Hafi
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए
Tehzeeb Hafi
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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं
Kaifi Azmi
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जिगर और दिल को बचाना भी है नज़र आप ही से मिलाना भी है मोहब्बत का हर भेद पाना भी है मगर अपना दामन बचाना भी है जो दिल तेरे ग़म का निशाना भी है क़तील-ए-जफ़ा-ए-ज़माना भी है ये बिजली चमकती है क्यूँँ दम-ब-दम चमन में कोई आशियाना भी है ख़िरद की इता'अत ज़रूरी सही यही तो जुनूँ का ज़माना भी है न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़' ज़माने को आगे बढ़ाना भी है
Asrar Ul Haq Majaz
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जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है मगर वो आज भी बरहम नहीं है बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है तक़ाज़े क्यूँँ करूँँ पैहम न साक़ी किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है 'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है
Asrar Ul Haq Majaz
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