ghazalKuch Alfaaz

जिगर और दिल को बचाना भी है नज़र आप ही से मिलाना भी है मोहब्बत का हर भेद पाना भी है मगर अपना दामन बचाना भी है जो दिल तेरे ग़म का निशाना भी है क़तील-ए-जफ़ा-ए-ज़माना भी है ये बिजली चमकती है क्यूँँ दम-ब-दम चमन में कोई आशियाना भी है ख़िरद की इता'अत ज़रूरी सही यही तो जुनूँ का ज़माना भी है न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़' ज़माने को आगे बढ़ाना भी है

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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ख़िरद की इता'अत ज़रूरी सही यही तो जुनूँ का ज़माना भी है न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़' ज़माने को आगे बढ़ाना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है

Asrar Ul Haq Majaz

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जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है मगर वो आज भी बरहम नहीं है बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है तक़ाज़े क्यूँँ करूँँ पैहम न साक़ी किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है 'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है

Asrar Ul Haq Majaz

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