ghazalKuch Alfaaz

काग़ज़ काग़ज़ धूल उड़ेगी फ़न बंजर हो जाएगा जिस दिन सूखे दिल के आँसू सब पत्थर हो जाएगा टूटेंगी जब नींद से पलकें सो जाऊँगा चुपके से जिस जंगल में रात पड़ेगी मेरा घर हो जाएगा ख़्वाबों के ये पंछी कब तक शोर करेंगे पलकों पर शाम ढलेगी और सन्नाटा शाख़ों पर हो जाएगा रात क़लम ले कर आएगी इतनी सियाही छिड़केगी दिन का सारा मंज़र-नामा बे-मंज़र हो जाएगा नाख़ुन से भी ईंट कुरेदें मिल-जुल कर हम-साए तो आँगन की दीवार न टूटे लेकिन दर हो जाएगा 'क़ैसर' रो लो ग़ज़लें कह लो बाक़ी है कुछ दर्द अभी अगली रुतों में यूँँ लगता है सब पत्थर हो जाएगा

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मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल तू नई सुब्ह के सूरज की है उजली सी किरन मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल अपनी ख़ुशियाँ मिरे आलाम से मंसूब न कर मुझ से मत माँग मिरा नाम मिरे साथ न चल तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा 'शकील' टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल

Shakeel Azmi

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यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है न बस में ज़िंदगी उस के न क़ाबू मौत पर उस का मगर इंसान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है

Rajesh Reddy

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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

Anjum Rehbar

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दशरथ जी की बंजर आँखें कैकेई की विषधर आँखें राम गए वन बनने भगवन कौशल्या की पत्थर आँखें भाई लखन सा कोई न दूजा चलने को हैं तत्पर आँखें आग लगी है सब आँखों में माँ सीता हैं पुष्कर आँखें उर्मिल को कोई क्या लिक्खे तन्हाई का अंबर आँखें काट गई हैं कर्म की रेखा इक दासी की ख़ंजर आँखें छोड़ नगर को जाते रघुवर सब लोगों की झर-झर आँखें

Ravi Goswami

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एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है धूप आँगन में फैल जाती है रंग-ए-मौसम है और बाद-ए-सबा शहर कूचों में ख़ाक उड़ाती है फ़र्श पर काग़ज़ उड़ते फिरते हैं मेज़ पर गर्द जमती जाती है सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर अब किसे रात भर जगाती है मैं भी इज़्न-ए-नवा-गरी चाहूँ बे-दिली भी तो लब हिलाती है सो गए पेड़ जाग उठी ख़ुश्बू ज़िंदगी ख़्वाब क्यूँँ दिखाती है उस सरापा वफ़ा की फ़ुर्क़त में ख़्वाहिश-ए-ग़ैर क्यूँँ सताती है आप अपने से हम-सुख़न रहना हम-नशीं साँस फूल जाती है क्या सितम है कि अब तिरी सूरत ग़ौर करने पे याद आती है कौन इस घर की देख-भाल करे रोज़ इक चीज़ टूट जाती है

Jaun Elia

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चाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था मैं ने इक बार तिरा नाम सुना था क्या था अब के बिछड़े हैं तो लगता है कि कुछ टूट गया मेरा दिल था कि तिरा अहद-ए-वफ़ा था क्या था ख़ुद-कुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा मैं ने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था तुम तो कहते थे ख़ुदा तुम से ख़फ़ा है 'क़ैसर' डूबते वक़्त वो जो इक हाथ बढ़ा था क्या था

Qaisar-ul-Jafri

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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है किस को पत्थर मारूँ 'क़ैसर' कौन पराया है शीश-महल में इक इक चेहरा अपना लगता है

Qaisar-ul-Jafri

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दश्त-ए-तन्हाई में कल रात हवा कैसी थी देर तक टूटते लम्हों की सदा कैसी थी ज़िंदगी ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा अब तक उम्र भर सर से न उतरी ये बला कैसी थी सुनते रहते थे मोहब्बत के फ़साने क्या क्या बूँद भर दिल पे न बरसी ये घटा कैसी थी क्या मिला फ़ैसला-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ कर के तुम जो बिछड़े थे तो होंटों पे दुआ कैसी थी टूट कर ख़ुद जो वो बिखरा है तो मालूम हुआ जिस से लिपटा था वो दीवार-ए-अना कैसी थी जिस्म से नोच के फेंकी भी तो ख़ुशबू न गई ये रिवायात की बोसीदा क़बा कैसी थी डूबते वक़्त भँवर पूछ रहा है 'क़ैसर' जब किनारे से चले थे तो फ़ज़ा कैसी थी

Qaisar-ul-Jafri

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तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ मुझे तुम्हें भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे वो फूल जो मिरे दामन से हो गए मंसूब ख़ुदा करे उन्हें बाज़ार की हवा न लगे न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में वो मुँह छुपा के भी जाए तो बे-वफ़ा न लगे तू इस तरह से मिरे साथ बे-वफ़ाई कर कि तेरे बा'द मुझे कोई बे-वफ़ा न लगे तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िंदगी 'क़ैसर' कि एक घूँट में मुमकिन है बद-मज़ा न लगे

Qaisar-ul-Jafri

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सदियों तवील रात के ज़ानू से सर उठा सूरज उफ़ुक़ से झांक रहा है नज़र उठा इतनी बुरी नहीं है खंडर की ज़मीन भी इस ढेर को समेट नए बाम-ओ-दर उठा मुमकिन है कोई हाथ समुंदर लपेट दे कश्ती में सौ शिगाफ़ हों लंगर मगर उठा शाख़-ए-चमन में आग लगा कर गया था क्यूँ अब ये अज़ाब-ए-दर-बदरी उम्र भर उठा मंज़िल पे आ के देख रहा हूं मैं आइना कितना ग़ुबार था जो सर-ए-रहगुज़र उठा सहरा में थोड़ी देर ठहरना ग़लत न था ले गर्द-बाद बैठ गया अब तो सर उठा दस्तक में कोई दर्द की ख़ुश्बू ज़रूर थी दरवाज़ा खोलने के लिए घर का घर उठा 'क़ैसर' मता-ए-दिल का ख़रीदार कौन है बाज़ार उजड़ गया है दुकान-ए-हुनर उठा

Qaisar-ul-Jafri

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