ghazalKuch Alfaaz

सदियों तवील रात के ज़ानू से सर उठा सूरज उफ़ुक़ से झांक रहा है नज़र उठा इतनी बुरी नहीं है खंडर की ज़मीन भी इस ढेर को समेट नए बाम-ओ-दर उठा मुमकिन है कोई हाथ समुंदर लपेट दे कश्ती में सौ शिगाफ़ हों लंगर मगर उठा शाख़-ए-चमन में आग लगा कर गया था क्यूँ अब ये अज़ाब-ए-दर-बदरी उम्र भर उठा मंज़िल पे आ के देख रहा हूं मैं आइना कितना ग़ुबार था जो सर-ए-रहगुज़र उठा सहरा में थोड़ी देर ठहरना ग़लत न था ले गर्द-बाद बैठ गया अब तो सर उठा दस्तक में कोई दर्द की ख़ुश्बू ज़रूर थी दरवाज़ा खोलने के लिए घर का घर उठा 'क़ैसर' मता-ए-दिल का ख़रीदार कौन है बाज़ार उजड़ गया है दुकान-ए-हुनर उठा

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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अभी इक शोर सा उठा है कहीं कोई ख़ामोश हो गया है कहीं है कुछ ऐसा कि जैसे ये सब कुछ इस से पहले भी हो चुका है कहीं तुझ को क्या हो गया कि चीज़ों को कहीं रखता है ढूँढ़ता है कहीं जो यहाँ से कहीं न जाता था वो यहाँ से चला गया है कहीं आज शमशान की सी बू है यहाँ क्या कोई जिस्म जल रहा है कहीं हम किसी के नहीं जहाँ के सिवा ऐसी वो ख़ास बात क्या है कहीं तू मुझे ढूँड मैं तुझे ढूँडूँ कोई हम में से रह गया है कहीं कितनी वहशत है दरमियान-ए-हुजूम जिस को देखो गया हुआ है कहीं मैं तो अब शहर में कहीं भी नहीं क्या मिरा नाम भी लिखा है कहीं इसी कमरे से कोई हो के विदाअ'' इसी कमरे में छुप गया है कहीं मिल के हर शख़्स से हुआ महसूस मुझ से ये शख़्स मिल चुका है कहीं

Jaun Elia

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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चाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था मैं ने इक बार तिरा नाम सुना था क्या था अब के बिछड़े हैं तो लगता है कि कुछ टूट गया मेरा दिल था कि तिरा अहद-ए-वफ़ा था क्या था ख़ुद-कुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा मैं ने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था तुम तो कहते थे ख़ुदा तुम से ख़फ़ा है 'क़ैसर' डूबते वक़्त वो जो इक हाथ बढ़ा था क्या था

Qaisar-ul-Jafri

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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है किस को पत्थर मारूँ 'क़ैसर' कौन पराया है शीश-महल में इक इक चेहरा अपना लगता है

Qaisar-ul-Jafri

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मायूसी की बर्फ़ पड़ी थी लेकिन मौसम सर्द न था आज से पहले दिल में यारो! इतना ठंडा दर्द न था तन्हाई की बोझल रातें पहले भी तो बरसी थीं ज़ख़्म नहीं थे इतने क़ातिल ग़म इतना बे-दर्द न था फिरते हैं अब रुस्वा होते कल तक ये रफ़्तार न थी शहर में थीं सौ कू-ए-मलामत दिल आवारा-गर्द न था मरने पर भी लौ देती थी दीवाने के दिल की आग पथराई थीं आँखें लेकिन फूल सा चेहरा ज़र्द न था हर्फ़-ए-तसल्ली मौज-ए-हवा थे मौज-ए-हवा से होता क्या सीने का पत्थर था 'क़ैसर', ग़म दामन की गर्द न था

Qaisar-ul-Jafri

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तिरी गली में तमाशा किए ज़माना हुआ फिर इस के बा'द न आना हुआ न जाना हुआ कुछ इतना टूट के चाहा था मेरे दिल ने उसे वो शख़्स मेरी मुरव्वत में बे-वफ़ा न हुआ हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थी हमीं को शम्अ' जलाने का हौसला न हुआ मिरे ख़ुलूस की सैक़ल-गरी भी हार गई वो जाने कौन सा पत्थर था आईना न हुआ मैं ज़हर पीता रहा ज़िंदगी के हाथों से ये और बात है मेरा बदन हरा न हुआ शुऊ'र चाहिए तरतीब-ए-ख़ार-ओ-ख़स के लिए क़फ़स को तोड़ के रक्खा तो आशियाना हुआ हमारे गाँव की मिट्टी ही रेत जैसी थी ये एक रात का सैलाब तो बहाना हुआ किसी के साथ गईं दिल की धड़कनें 'क़ैसर' फिर इस के बा'द मोहब्बत का हादिसा न हुआ

Qaisar-ul-Jafri

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काग़ज़ काग़ज़ धूल उड़ेगी फ़न बंजर हो जाएगा जिस दिन सूखे दिल के आँसू सब पत्थर हो जाएगा टूटेंगी जब नींद से पलकें सो जाऊँगा चुपके से जिस जंगल में रात पड़ेगी मेरा घर हो जाएगा ख़्वाबों के ये पंछी कब तक शोर करेंगे पलकों पर शाम ढलेगी और सन्नाटा शाख़ों पर हो जाएगा रात क़लम ले कर आएगी इतनी सियाही छिड़केगी दिन का सारा मंज़र-नामा बे-मंज़र हो जाएगा नाख़ुन से भी ईंट कुरेदें मिल-जुल कर हम-साए तो आँगन की दीवार न टूटे लेकिन दर हो जाएगा 'क़ैसर' रो लो ग़ज़लें कह लो बाक़ी है कुछ दर्द अभी अगली रुतों में यूँँ लगता है सब पत्थर हो जाएगा

Qaisar-ul-Jafri

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