ghazalKuch Alfaaz

तिरी गली में तमाशा किए ज़माना हुआ फिर इस के बा'द न आना हुआ न जाना हुआ कुछ इतना टूट के चाहा था मेरे दिल ने उसे वो शख़्स मेरी मुरव्वत में बे-वफ़ा न हुआ हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थी हमीं को शम्अ' जलाने का हौसला न हुआ मिरे ख़ुलूस की सैक़ल-गरी भी हार गई वो जाने कौन सा पत्थर था आईना न हुआ मैं ज़हर पीता रहा ज़िंदगी के हाथों से ये और बात है मेरा बदन हरा न हुआ शुऊ'र चाहिए तरतीब-ए-ख़ार-ओ-ख़स के लिए क़फ़स को तोड़ के रक्खा तो आशियाना हुआ हमारे गाँव की मिट्टी ही रेत जैसी थी ये एक रात का सैलाब तो बहाना हुआ किसी के साथ गईं दिल की धड़कनें 'क़ैसर' फिर इस के बा'द मोहब्बत का हादिसा न हुआ

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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चाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था मैं ने इक बार तिरा नाम सुना था क्या था अब के बिछड़े हैं तो लगता है कि कुछ टूट गया मेरा दिल था कि तिरा अहद-ए-वफ़ा था क्या था ख़ुद-कुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा मैं ने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था तुम तो कहते थे ख़ुदा तुम से ख़फ़ा है 'क़ैसर' डूबते वक़्त वो जो इक हाथ बढ़ा था क्या था

Qaisar-ul-Jafri

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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है किस को पत्थर मारूँ 'क़ैसर' कौन पराया है शीश-महल में इक इक चेहरा अपना लगता है

Qaisar-ul-Jafri

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दश्त-ए-तन्हाई में कल रात हवा कैसी थी देर तक टूटते लम्हों की सदा कैसी थी ज़िंदगी ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा अब तक उम्र भर सर से न उतरी ये बला कैसी थी सुनते रहते थे मोहब्बत के फ़साने क्या क्या बूँद भर दिल पे न बरसी ये घटा कैसी थी क्या मिला फ़ैसला-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ कर के तुम जो बिछड़े थे तो होंटों पे दुआ कैसी थी टूट कर ख़ुद जो वो बिखरा है तो मालूम हुआ जिस से लिपटा था वो दीवार-ए-अना कैसी थी जिस्म से नोच के फेंकी भी तो ख़ुशबू न गई ये रिवायात की बोसीदा क़बा कैसी थी डूबते वक़्त भँवर पूछ रहा है 'क़ैसर' जब किनारे से चले थे तो फ़ज़ा कैसी थी

Qaisar-ul-Jafri

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काग़ज़ काग़ज़ धूल उड़ेगी फ़न बंजर हो जाएगा जिस दिन सूखे दिल के आँसू सब पत्थर हो जाएगा टूटेंगी जब नींद से पलकें सो जाऊँगा चुपके से जिस जंगल में रात पड़ेगी मेरा घर हो जाएगा ख़्वाबों के ये पंछी कब तक शोर करेंगे पलकों पर शाम ढलेगी और सन्नाटा शाख़ों पर हो जाएगा रात क़लम ले कर आएगी इतनी सियाही छिड़केगी दिन का सारा मंज़र-नामा बे-मंज़र हो जाएगा नाख़ुन से भी ईंट कुरेदें मिल-जुल कर हम-साए तो आँगन की दीवार न टूटे लेकिन दर हो जाएगा 'क़ैसर' रो लो ग़ज़लें कह लो बाक़ी है कुछ दर्द अभी अगली रुतों में यूँँ लगता है सब पत्थर हो जाएगा

Qaisar-ul-Jafri

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सदियों तवील रात के ज़ानू से सर उठा सूरज उफ़ुक़ से झांक रहा है नज़र उठा इतनी बुरी नहीं है खंडर की ज़मीन भी इस ढेर को समेट नए बाम-ओ-दर उठा मुमकिन है कोई हाथ समुंदर लपेट दे कश्ती में सौ शिगाफ़ हों लंगर मगर उठा शाख़-ए-चमन में आग लगा कर गया था क्यूँ अब ये अज़ाब-ए-दर-बदरी उम्र भर उठा मंज़िल पे आ के देख रहा हूं मैं आइना कितना ग़ुबार था जो सर-ए-रहगुज़र उठा सहरा में थोड़ी देर ठहरना ग़लत न था ले गर्द-बाद बैठ गया अब तो सर उठा दस्तक में कोई दर्द की ख़ुश्बू ज़रूर थी दरवाज़ा खोलने के लिए घर का घर उठा 'क़ैसर' मता-ए-दिल का ख़रीदार कौन है बाज़ार उजड़ गया है दुकान-ए-हुनर उठा

Qaisar-ul-Jafri

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