मायूसी की बर्फ़ पड़ी थी लेकिन मौसम सर्द न था आज से पहले दिल में यारो! इतना ठंडा दर्द न था तन्हाई की बोझल रातें पहले भी तो बरसी थीं ज़ख़्म नहीं थे इतने क़ातिल ग़म इतना बे-दर्द न था फिरते हैं अब रुस्वा होते कल तक ये रफ़्तार न थी शहर में थीं सौ कू-ए-मलामत दिल आवारा-गर्द न था मरने पर भी लौ देती थी दीवाने के दिल की आग पथराई थीं आँखें लेकिन फूल सा चेहरा ज़र्द न था हर्फ़-ए-तसल्ली मौज-ए-हवा थे मौज-ए-हवा से होता क्या सीने का पत्थर था 'क़ैसर', ग़म दामन की गर्द न था
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगा मुझ को तहज़ीब के बर्ज़ख़ का बनाया वारिस जुर्म ये भी मिरे अज्दाद के सर जाएगा
Parveen Shakir
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ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया मैं तो उस ज़ख़्म ही को भूल गया ज़ात-दर-ज़ात हम-सफ़र रह कर अजनबी अजनबी को भूल गया सुब्ह तक वज्ह-ए-जाँ-कनी थी जो बात मैं उसे शाम ही को भूल गया अहद-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं वज्ह-ए-वाबस्तगी को भूल गया क्यूँँ न हो नाज़ इस ज़ेहानत पर एक मैं हर किसी को भूल गया सब दलीलें तो मुझ को याद रहीं बहस क्या थी उसी को भूल गया सब से पुर-अम्न वाक़िआ' ये है आदमी आदमी को भूल गया क़हक़हा मारते ही दीवाना हर ग़म-ए-ज़िंदगी को भूल गया ख़्वाब-हा-ख़्वाब जिस को चाहा था रंग-हा-रंग उसी को भूल गया क्या क़यामत हुई अगर इक शख़्स अपनी ख़ुश-क़िस्मती को भूल गया सोच कर उस की ख़ल्वत-अंजुमनी वाँ मैं अपनी कमी को भूल गया सब बुरे मुझ को याद रहते हैं जो भला था उसी को भूल गया उन से वा'दा तो कर लिया लेकिन अपनी कम-फ़ुर्सती को भूल गया बस्तियो अब तो रास्ता दे दो अब तो मैं उस गली को भूल गया उस ने गोया मुझी को याद रखा मैं भी गोया उसी को भूल गया या'नी तुम वो हो वाक़ई? हद है मैं तो सच-मुच सभी को भूल गया आख़िरी बुत ख़ुदा न क्यूँँ ठहरे बुत-शिकन बुत-गरी को भूल गया अब तो हर बात याद रहती है ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया उस की ख़ुशियों से जलने वाला 'जौन' अपनी ईज़ा-दही को भूल गया
Jaun Elia
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महाज़-ए-जंग से पहले कहीं पड़ाव बनाओ नदी पे बाँध बनाने से पहले नाव बनाओ ये रात सिर्फ़ अँधेरी नहीं है सर्द भी है दिया बना लिया शाबाश अब अलाव बनाओ बनाना जानते हो तुम तो सब के दिल में जगह हमारे दिल में बना कर दिखाओ आओ बनाओ किताब फाड़ के भी नाव ही बनानी है तो सीधे पेड़ को काटो सुखाओ नाव बनाओ ये संग-ए-मरमरी नाख़ुन ये कत्थई पॉलिश कि कोई देखे तो कह दे हमारे घाव बनाओ बनाओ ताजमहल के बजाय ताश महल तमाम उम्र मुहब्बत करो गिराओ बनाओ तुम्हारी अच्छी बनेगी हमारे साथ कि तुम बहाने अच्छे बना लेते हो बनाओ बनाओ
Charagh Sharma
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चाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था मैं ने इक बार तिरा नाम सुना था क्या था अब के बिछड़े हैं तो लगता है कि कुछ टूट गया मेरा दिल था कि तिरा अहद-ए-वफ़ा था क्या था ख़ुद-कुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा मैं ने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था तुम तो कहते थे ख़ुदा तुम से ख़फ़ा है 'क़ैसर' डूबते वक़्त वो जो इक हाथ बढ़ा था क्या था
Qaisar-ul-Jafri
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तिरी गली में तमाशा किए ज़माना हुआ फिर इस के बा'द न आना हुआ न जाना हुआ कुछ इतना टूट के चाहा था मेरे दिल ने उसे वो शख़्स मेरी मुरव्वत में बे-वफ़ा न हुआ हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थी हमीं को शम्अ' जलाने का हौसला न हुआ मिरे ख़ुलूस की सैक़ल-गरी भी हार गई वो जाने कौन सा पत्थर था आईना न हुआ मैं ज़हर पीता रहा ज़िंदगी के हाथों से ये और बात है मेरा बदन हरा न हुआ शुऊ'र चाहिए तरतीब-ए-ख़ार-ओ-ख़स के लिए क़फ़स को तोड़ के रक्खा तो आशियाना हुआ हमारे गाँव की मिट्टी ही रेत जैसी थी ये एक रात का सैलाब तो बहाना हुआ किसी के साथ गईं दिल की धड़कनें 'क़ैसर' फिर इस के बा'द मोहब्बत का हादिसा न हुआ
Qaisar-ul-Jafri
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काग़ज़ काग़ज़ धूल उड़ेगी फ़न बंजर हो जाएगा जिस दिन सूखे दिल के आँसू सब पत्थर हो जाएगा टूटेंगी जब नींद से पलकें सो जाऊँगा चुपके से जिस जंगल में रात पड़ेगी मेरा घर हो जाएगा ख़्वाबों के ये पंछी कब तक शोर करेंगे पलकों पर शाम ढलेगी और सन्नाटा शाख़ों पर हो जाएगा रात क़लम ले कर आएगी इतनी सियाही छिड़केगी दिन का सारा मंज़र-नामा बे-मंज़र हो जाएगा नाख़ुन से भी ईंट कुरेदें मिल-जुल कर हम-साए तो आँगन की दीवार न टूटे लेकिन दर हो जाएगा 'क़ैसर' रो लो ग़ज़लें कह लो बाक़ी है कुछ दर्द अभी अगली रुतों में यूँँ लगता है सब पत्थर हो जाएगा
Qaisar-ul-Jafri
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दश्त-ए-तन्हाई में कल रात हवा कैसी थी देर तक टूटते लम्हों की सदा कैसी थी ज़िंदगी ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा अब तक उम्र भर सर से न उतरी ये बला कैसी थी सुनते रहते थे मोहब्बत के फ़साने क्या क्या बूँद भर दिल पे न बरसी ये घटा कैसी थी क्या मिला फ़ैसला-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ कर के तुम जो बिछड़े थे तो होंटों पे दुआ कैसी थी टूट कर ख़ुद जो वो बिखरा है तो मालूम हुआ जिस से लिपटा था वो दीवार-ए-अना कैसी थी जिस्म से नोच के फेंकी भी तो ख़ुशबू न गई ये रिवायात की बोसीदा क़बा कैसी थी डूबते वक़्त भँवर पूछ रहा है 'क़ैसर' जब किनारे से चले थे तो फ़ज़ा कैसी थी
Qaisar-ul-Jafri
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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है किस को पत्थर मारूँ 'क़ैसर' कौन पराया है शीश-महल में इक इक चेहरा अपना लगता है
Qaisar-ul-Jafri
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