ghazalKuch Alfaaz

कभी ख़ुद को छू कर नहीं देखता हूँ ख़ुदा जाने बस वहम में मुब्तला हूँ कहाँ तक ये रफ़्तार क़ाएम रहेगी कहीं अब उसे रोकना चाहता हूँ वो आ कर मना ले तो क्या हाल होगा ख़फ़ा हो के जब इतना ख़ुश हो रहा हूँ फ़क़त ये जताता हूँ आवाज़ दे कर कि मैं भी उसे नाम से जानता हूँ गली में सब अच्छा ही कहते थे मुझ को मुझे क्या पता था मैं इतना बुरा हूँ नहीं ये सफ़र वापसी का नहीं है उसे ढूँडने अपने घर जा रहा हूँ

Related Ghazal

ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

80 likes

तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

81 likes

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

465 likes

यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

526 likes

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

More from Shariq Kaifi

लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी अब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन-सारी भी वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई अपने दुश्मन को दुआ देने की हुश्यारी भी उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं ठोकरें खाईं तो कुछ आए समझदारी भी अब जो किरदार मुझे करना है मुश्किल है बहुत मस्त होने का दिखावा भी है सर भारी भी

Shariq Kaifi

3 likes

ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है आँख खुल जाए तो मुसीबत है जिस्म आया किसी के हिस्से में दिल किसी और की अमानत है जान देने का वक़्त आ ही गया इस तमाशे के बा'द फ़ुर्सत है उम्र भर जिस के मश्वरों पे चले वो परेशान है तो हैरत है अब सँवरने का वक़्त उस को नहीं जब हमें देखने की फ़ुर्सत है उस पे उतने ही रंग खुलते हैं जिस की आँखों में जितनी हैरत है

Shariq Kaifi

1 likes

सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है सोते में भी जैसे कोई सिसकी लेता है घर में तो इस माहौल का मैं आदी हूँ लेकिन बाज़ारों की वीरानी से दम घुटता है मुद्दत से मैं सोच रहा था अब समझा हूँ जेब और आँख के ख़ाली-पन में क्या रिश्ता है इतने लोग मुझे रुख़्सत करने आए हैं घर वापस जाना भी तमाशा सा लगता है लोग तो अपनी जानिब से कुछ जोड़ ही लेंगे इतनी अधूरी बातें हैं वो क्यूँँ करता है अपनी क्या इन रस्तों के बारे में सोचूँ उन का सफ़र तो मेरी उम्र से भी लम्बा है उस की आँखों से ओझल मत होना 'शारिक़' पीछा करने वाला बहुत तन्हा होता है

Shariq Kaifi

5 likes

बड़ा है दुख सो हासिल है ये आसानी मुझे कि हिम्मत ही नहीं कुछ याद करने की मुझे चला आता है चुपके से रज़ाई में मिरी बुरी लगती है सूरज की ये बेबाकी मुझे छुपाता फिर रहा हूँ ख़ुद को मैं किस से यहाँ अगर पहचानने वाला नहीं कोई मुझे गुज़र जाएगी सारी ज़िंदगी उम्मीद में न जीने देगी ये जीने की तय्यारी मुझे अगर कम बोलता हूँ मैं तो क्यूँँ बेचैन हो तुम्हीं से तो लगी है चुप की बीमारी मुझे अचानक कुछ हुआ होता तो कोई बात थी न जाने क्यूँँ हुई इस दर्जा हैरानी मुझे

Shariq Kaifi

2 likes

गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है उस एक पल से कभी कितना ख़ौफ़ खाया है उसी निगाह ने आँखों को कर दिया पत्थर उसी निगाह में सब कुछ नज़र भी आया है ये तंज़ यूँँ भी है इक इम्तिहान मेरे लिए तिरे लबों से कोई और मुस्कुराया है बहे रक़ीब के आँसू भी मेरे गालों पर ये सानेहा भी मोहब्बत में पेश आया है ये कोई और है तेरी तरफ़ सरकता हुआ अँधेरा होते ही जो मुझ में आ समाया है हमारे इश्क़ से मरऊब इस क़दर भी न हो ये ख़ूँ तो एक अदाकार ने बहाएा है यहाँ तो रेत है पत्थर हैं और कुछ भी नहीं वो क्या दिखाने मुझे इतनी दूर लाया है बहुत से बोझ हैं दिल पर ये कोई ऐसा नहीं ये दुख किसी ने हमारे लिए उठाया है

Shariq Kaifi

4 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Shariq Kaifi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Shariq Kaifi's ghazal.