ghazalKuch Alfaaz

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई  मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई  मिरी दास्ताँ का उरूज था तिरी नर्म पलकों की छाँव में  मिरे साथ था तुझे जागना तिरी आँख कैसे झपक गई  भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले  न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिजक गई  तिरे हाथ से मेरे होंट तक वही इंतिज़ार की प्यास है  मिरे नाम की जो शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई  तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं  तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई

Bashir Badr11 Likes

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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मिरी नज़र में ख़ाक तेरे आइने पे गर्द है ये चाँद कितना ज़र्द है ये रात कितनी सर्द है कभी कभी तो यूँँ लगा कि हम सभी मशीन हैं तमाम शहर में न कोई ज़न न कोई मर्द है ख़ुदा की नज़्मों की किताब सारी काएनात है ग़ज़ल के शे'र की तरह हर एक फ़र्द फ़र्द है हयात आज भी कनीज़ है हुज़ूर-ए-जब्र में जो ज़िंदगी को जीत ले वो ज़िंदगी का मर्द है इसे तबर्रुक-ए-हयात कह के पलकों पर रखूँ अगर मुझे यक़ीन हो ये रास्ते की गर्द है वो जिन के ज़िक्र से रगों में दौड़ती थीं बिजलियाँ उन्हीं का हाथ हम ने छू के देखा कितना सर्द है

Bashir Badr

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ख़ून पत्तों पे जमा हो जैसे फूल का रंग हरा हो जैसे बारहा ये हमें महसूस हुआ दर्द सीने का ख़ुदा हो जैसे यूँँ तरस खा के न पूछो अहवाल तीर सीने पे लगा हो जैसे फूल की आँख में शबनम क्यूँँ है सब हमारी ही ख़ता हो जैसे किर्चें चुभती हैं बहुत सीने में आइना टूट गया हो जैसे सब हमें देखने आते हैं मगर नींद आँखों से ख़फ़ा हो जैसे अब चराग़ों की ज़रूरत भी नहीं चाँद इस दिल में छुपा हो जैसे

Bashir Badr

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जब सहर चुप हो हँसा लो हम को जब अँधेरा हो जला लो हम को हम हक़ीक़त हैं नज़र आते हैं दास्तानों में छुपा लो हम को ख़ून का काम रवाँ रहना है जिस जगह चाहो बहा लो हम को दिन न पा जाए कहीं शब का राज़ सुब्ह से पहले उठा लो हम को हम ज़माने के सताए हैं बहुत अपने सीने से लगा लो हम को वक़्त के होंट हमें छू लेंगे अन-कहे बोल हैं गा लो हम को

Bashir Badr

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चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली सह में सह में हाथों ने इक किताब फिर खोली दाएरे अँधेरों के रौशनी के पोरों ने कोट के बटन खोले टाई की गिरह खोली शीशे की सिलाई में काले भूत का चढ़ना बाम काठ का घोड़ा नीम काँच की गोली बर्फ़ में दबा मक्खन मौत रेल और रिक्शा ज़िंदगी ख़ुशी रिक्शा रेल मोटरें डोली इक किताब चाँद और पेड़ सब के काले कॉलर पर ज़ेहन टेप की गर्दिश मुँह में तोतों की बोली वो नहीं मिली हम को हुक बटन सरकती ज़ीन ज़िप के दाँत खुलते ही आँख से गिरी चोली

Bashir Badr

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शाम आँखों में आँख पानी में और पानी सरा-ए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दिए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जाएगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँडूँ आग में ख़ाक में कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं भी हूँ रवानी में

Bashir Badr

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