कैसे मुमकिन था तुझे दिल से भुलाए जाते हक़ यही था कि तेरे नाज़ उठाए जाते ज़िन्दगी रास्ता देती नहीं आसानी से हम-सफ़र यूँँ ही नहीं दोस्त बनाए जाते तेरी ख़ातिर तो हम अपनों से भी लड़ बैठे थे ख़्वाब दीवार से कैसे न लगाए जाते देखते हम भी कि किस किस की तलब है दुनिया जितने क़ैदी थे सभी सामने लाए जाते आज़माना ही तुझे होता अगर मेरी जान रास्ता दे के मसाइल न बताए जाते पहले हम रूह की दीवार गिराते और फिर राह में तेरी कई जाल बिछाए जाते फ़ासला रखते मगर इतना कि साँस आती रहे तेरी क़ुर्बत में कई फूल खिलाए जाते
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई
Jaun Elia
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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क्यूँ तेरे दर से ही चुप चाप गुज़र आते हैं जो ख़ुदाओं की तरह बन के शरर आते हैं वो मेरा हो के भी हो सकता नहीं हैरत है फिर भी हर हाल में हम साथ नज़र आते हैं वक़्त है दोस्त इसे ध्यान में रख काम में ला ख़्वाब वीरान जज़ीरों पे उतर आते हैं उस के वहदत ने मुझे अपनी तरफ़ खींचा था वरना रस्ते में तो कितने ही शजर आते हैं हर कोई चाँद सा चेहरा नहीं होता सच्चा आबशारों की तहों में भी खंडर आते हैं मैं कि हैरान हूँ इस रब्त पे हम दोनों के ले के हर बार अदू तेरी ख़बर आते हैं
Tajdeed Qaiser
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सुकून तुम से मेरा इत्मीनान तुम से है हसीन शख़्स मेरा कुल जहान तुम से है तुम्हारा लम्स मुझे बेशुमार करता है मेरी निग़ाह है तुम से उड़ान तुम से है मैं राज़-ए-इश्क़ बयाँ कर नहीं सकी अब तक यही ख़बर है ज़मान-ओ-मकान तुम से है कहीं मैं होश जो खो दूँ तो सामने आना बिखर के देखा है मेरा धियान तुम से है जो तुम नहीं तो करें किस पे बात हम 'तजदीद' कि अपनी ख़ामुशी अपना बयान तुम से है
Tajdeed Qaiser
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इसीलिए तो यहाँ रतजगा ज़ियादा है कि मेरे ख़्वाब में वो जागता ज़ियादा है मुझे तो दूर से आदत है उस को तकने की सो उस का एक नज़र देखना ज़ियादा है उसे तमीज़ भी तो होनी चाहिए थी फिर अगर वो आप से लिखा पढ़ा ज़ियादा है मैं हर किसी पे बहुत ऐतिबार करती हूँ ख़ुशी की बात है पर सानेहा ज़ियादा है
Tajdeed Qaiser
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उस को ज़िदस तो अच्छा नहीं रोकना छोड़ दो उस की मर्ज़ी है तुम उस पे ये फ़ैसला छोड़ दो मैं ने बस इतना पूछा था क्या देखते हो भला मैं ने ये कब कहा था मुझे देखना छोड़ दो तुम मिलोगे नहीं तो मैं जीते जी मर जाऊँगी बा-ख़ुदा ऐसी ख़ुशफ़हमियाँ पालना छोड़ दो मेरी आँखों पे पट्टी बँधी है बँधी रहने दो उस के बारे में तुम भी बुरा सोचना छोड़ दो गीली मिट्टी की ख़ुशबू मुझे सोने देती नहीं मेरे बालों में तुम उँगलियाँ फेरना छोड़ दो
Tajdeed Qaiser
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हमारी छोटी सी एक ख़्वाहिश क़ुबूल कर ले फिर उस के बदले में जो भी चाहे वसूल कर ले जिसे भी चाहे बिठाए सर पे घुमाए दुनिया जिसे भी चाहे तू अपने पैरों की धूल कर ले वहाँ तू ख़्वाहिश की बारगाह में झुका हुआ था यहाँ मुहब्बत के ज़ाविए को असूल कर ले अभी तुझे दीन दुनियादारी कहाँ पता है अभी तो कुछ भी नहीं गया कोई भूल कर ले
Tajdeed Qaiser
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