कल शब लिबास उस ने जो पहना गुलाब का ख़ुशबू गुलाब की कहीं चर्चा गुलाब का देखी हसीन लोगों की औलाद भी हसीन पौधे से उगता देखा है पौधा गुलाब का मैं था गुलाब तोड़ने वालों के शहर से और उस को चाहिए था बगीचा गुलाब का सुनते हो आज टूट गया लाडले का दिल अब उस के आगे ज़िक्र न करना गुलाब का
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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए जो मेरे दिल से निकला है दु'आओं से निकल जाए हम ऐसे लोग जो दुश्मन के रोने पर ठहर जाएँ वो ऐसा शख़्स जो अपनों की लाशों से निकल जाए पढ़ाने का अगर मतलब है हाथों से निकल जाना ख़ुदाया फिर मिरी बेटी भी हाथों से निकल जाए वही इक शख़्स था मेरा यहाँ पर जी लगाने को उसी को चाहते थे सब कि गाँव से निकल जाए इधर तो छू रही है जिस्म मेरा ठंडे हाथों से उधर वो चाहती है रात बातों से निकल जाए नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए
Kushal Dauneria
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वो जब बंद कमरे में लटका हुआ था ये किस को पता था खिलाड़ी मोहब्बत में बिल्कुल नया था ये किस को पता था कि उन जाहिलों ने उसे आदमी की तरह भी न रक्खा मैं बचपन से जिस शख़्स को पूजता था ये किस को पता था मैं जब तक उसे जीत लेने की तैयारियाँ कर रहा था वो तब तक किसी और का हो चुका था ये किस को पता था
Kushal Dauneria
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जिस शाम उस को ट्रेन में बैठा के आया था मैं उस को उस के प्यार से मिलवा के आया था उस की बसी बसाई मैं दुनिया उजाड़ कर जो खा नहीं सका उसे फैला के आया था मेरे नसीब में कहीं बैठा तुम्हारा दुख लगता था जैसे माँ की क़सम खा के आया था
Kushal Dauneria
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मैं ने तो बस मज़ाक़ में पूछा ख़राब है? वो पीर हाथ देख के बोला ख़राब है हर दिन उसे दिखाया कि कितने शरीफ़ हैं हर रात उस के बारे में सोचा ख़राब है ये इश्क़ हो चुका है तुरुप-चाल ताश की आगे ग़ुलाम के मिरा इक्का ख़राब है आज़ाद लड़कियों से भली क़ैद औरतें मतलब कि झील ठीक है दरिया ख़राब है हम जिस ख़ुदा की आस में बैठे हैं रात दिन वो जा चुका है बोल के दुनिया ख़राब है ज़्यादा किसी की मौत पे रोना नहीं सही और जन्मदिन पे शोर शराबा ख़राब है आधा भी उस के जितना मैं रौशन नहीं हुआ मैं जिस दिए को बोल रहा था ख़राब है
Kushal Dauneria
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हुस्न इक गुलसिताँ का माली है आँख शहतूत बदन डाली है मैं ने कुछ देर उदासी हँस कर मारी है मार नहीं डाली है साज-ओ-श्रृंगार से चमकाया बदन एक ही नोट वो भी जाली है
Kushal Dauneria
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