कर लूँगा जम्अ' दौलत-ओ-ज़र उस के बा'द क्या ले लूँगा शानदार सा घर उस के बा'द क्या मय की तलब जो होगी तो बन जाऊँगा मैं रिन्द कर लूँगा मय-कदों का सफ़र उस के बा'द क्या होगा जो शौक़ हुस्न से राज़-ओ-नियाज़ का कर लूँगा गेसुओं में सहर उस के बा'द क्या शे'र-ओ-सुख़न की ख़ूब सजाऊँगा महफ़िलें दुनिया में होगा नाम मगर उस के बा'द क्या मौज आएगी तो सारे जहाँ की करूँँगा सैर वापस वही पुराना नगर उस के बा'द क्या इक रोज़ मौत ज़ीस्त का दर खट-खटाएगी बुझ जाएगा चराग़-ए-क़मर उस के बा'द क्या उट्ठी थी ख़ाक ख़ाक से मिल जाएगी वहीं फिर उस के बा'द किस को ख़बर उस के बा'द क्या
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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छोटी सी बे-रुख़ी पे शिकायत की बात है और वो भी इस लिए कि मोहब्बत की बात है मैं ने कहा कि आए हो कितने दिनों के बा'द कहने लगे हुज़ूर ये फ़ुर्सत की बात है मैं ने कहा कि मिल के भी हम क्यूँँ न मिल सके कहने लगे हुज़ूर ये क़िस्मत की बात है मैं ने कहा कि रहते हो हर बात पर ख़फ़ा कहने लगे हुज़ूर ये क़ुर्बत की बात है मैं ने कहा कि देते हैं दिल तुम भी लाओ दिल कहने लगे कि ये तो तिजारत की बात है मैं ने कहा कभी है सितम और कभी करम कहने लगे कि ये तो तबीअ'त की बात है
Qamar Jalalabadi
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या-रब तिरे करम से ये सौदा करेंगे हम दुनिया में पी के ख़ुल्द में तौबा करेंगे हम यूँँ रस्म-ए-इश्क़-ओ-हुस्न को रुस्वा करेंगे हम तुम मुंतज़िर रहोगे न आया करेंगे हम आईने में ख़ुद अपना तमाशा करेंगे हम यूँँ भी शब-ए-फ़िराक़ गुज़ारा करेंगे हम जब तक न आओगे नज़र ऐसा करेंगे हम हर रोज़ इक ख़ुदा को तराशा करेंगे हम तुझ को बिठा के दूर से देखा करेंगे हम यूँँ भी तिरे ग़ुरूर से खेला करेंगे हम जा तुझ से बे-नियाज़ हुए भूले तेरा ज़िक्र तू चाहेगा तो तेरी तमन्ना करेंगे हम
Qamar Jalalabadi
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इक हसीन ला-जवाब देखा है रात को आफ़्ताब देखा है गोरा मुखड़ा ये सुर्ख़ गाल तिरे चाँदनी में गुलाब देखा है नर्गिसी आँख ज़ुल्फ़ शब-रंगी बादलों का जवाब देखा है झूमते जाम सा छलकता बदन एक जाम-ए-शराब देखा है हम तो मिल कर न मिल सके तुम को तुम को देखा कि ख़्वाब देखा है
Qamar Jalalabadi
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वो सितम-गर है ख़यालात समझने वाला मुझ से पहले मिरे जज़्बात समझने वाला मैं ने रक्खा है हमेशा ही तबस्सुम लब पर रो दिया क्यूँँ मिरे हालात समझने वाला जो न समझे तेरी मंज़िल वो यूँँही चलता रहा रुक गया तेरे मक़ामात समझने वाला जो न समझे वो बनाते रहे लाखों बातें हुआ ख़ामोश तिरी बात समझने वाला राज़-ए-तक़्दीर पे क्या रौशनी डालेगा कोई ख़ुद सवाली है सवालात समझने वाला
Qamar Jalalabadi
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