ghazalKuch Alfaaz

वो सितम-गर है ख़यालात समझने वाला मुझ से पहले मिरे जज़्बात समझने वाला मैं ने रक्खा है हमेशा ही तबस्सुम लब पर रो दिया क्यूँँ मिरे हालात समझने वाला जो न समझे तेरी मंज़िल वो यूँँही चलता रहा रुक गया तेरे मक़ामात समझने वाला जो न समझे वो बनाते रहे लाखों बातें हुआ ख़ामोश तिरी बात समझने वाला राज़-ए-तक़्दीर पे क्या रौशनी डालेगा कोई ख़ुद सवाली है सवालात समझने वाला

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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छोटी सी बे-रुख़ी पे शिकायत की बात है और वो भी इस लिए कि मोहब्बत की बात है मैं ने कहा कि आए हो कितने दिनों के बा'द कहने लगे हुज़ूर ये फ़ुर्सत की बात है मैं ने कहा कि मिल के भी हम क्यूँँ न मिल सके कहने लगे हुज़ूर ये क़िस्मत की बात है मैं ने कहा कि रहते हो हर बात पर ख़फ़ा कहने लगे हुज़ूर ये क़ुर्बत की बात है मैं ने कहा कि देते हैं दिल तुम भी लाओ दिल कहने लगे कि ये तो तिजारत की बात है मैं ने कहा कभी है सितम और कभी करम कहने लगे कि ये तो तबीअ'त की बात है

Qamar Jalalabadi

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या-रब तिरे करम से ये सौदा करेंगे हम दुनिया में पी के ख़ुल्द में तौबा करेंगे हम यूँँ रस्म-ए-इश्क़-ओ-हुस्न को रुस्वा करेंगे हम तुम मुंतज़िर रहोगे न आया करेंगे हम आईने में ख़ुद अपना तमाशा करेंगे हम यूँँ भी शब-ए-फ़िराक़ गुज़ारा करेंगे हम जब तक न आओगे नज़र ऐसा करेंगे हम हर रोज़ इक ख़ुदा को तराशा करेंगे हम तुझ को बिठा के दूर से देखा करेंगे हम यूँँ भी तिरे ग़ुरूर से खेला करेंगे हम जा तुझ से बे-नियाज़ हुए भूले तेरा ज़िक्र तू चाहेगा तो तेरी तमन्ना करेंगे हम

Qamar Jalalabadi

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इक हसीन ला-जवाब देखा है रात को आफ़्ताब देखा है गोरा मुखड़ा ये सुर्ख़ गाल तिरे चाँदनी में गुलाब देखा है नर्गिसी आँख ज़ुल्फ़ शब-रंगी बादलों का जवाब देखा है झूमते जाम सा छलकता बदन एक जाम-ए-शराब देखा है हम तो मिल कर न मिल सके तुम को तुम को देखा कि ख़्वाब देखा है

Qamar Jalalabadi

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कर लूँगा जम्अ' दौलत-ओ-ज़र उस के बा'द क्या ले लूँगा शानदार सा घर उस के बा'द क्या मय की तलब जो होगी तो बन जाऊँगा मैं रिन्द कर लूँगा मय-कदों का सफ़र उस के बा'द क्या होगा जो शौक़ हुस्न से राज़-ओ-नियाज़ का कर लूँगा गेसुओं में सहर उस के बा'द क्या शे'र-ओ-सुख़न की ख़ूब सजाऊँगा महफ़िलें दुनिया में होगा नाम मगर उस के बा'द क्या मौज आएगी तो सारे जहाँ की करूँँगा सैर वापस वही पुराना नगर उस के बा'द क्या इक रोज़ मौत ज़ीस्त का दर खट-खटाएगी बुझ जाएगा चराग़-ए-क़मर उस के बा'द क्या उट्ठी थी ख़ाक ख़ाक से मिल जाएगी वहीं फिर उस के बा'द किस को ख़बर उस के बा'द क्या

Qamar Jalalabadi

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