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ख़ाक ही ख़ाक थी और ख़ाक भी क्या कुछ नहीं था मैं जब आया तो मेरे घर की जगह कुछ नहीं था। क्या करूँं तुझ सेे ख़यानत नहीं कर सकता मैं वरना उस आँख में मेरे लिए क्या कुछ नहीं था। ये भी सच है मुझे कभी उस ने कुछ ना कहा ये भी सच है कि उस औरत से छुपा कुछ नहीं था। अब वो मेरे ही किसी दोस्त की मनकूहा है मैं पलट जाता मगर पीछे बचा कुछ नहीं था।

Tehzeeb Hafi61 Likes

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ख़ुद पर जब इश्क़ की वहशत को मुसल्लत करूँँगा इस कदर ख़ाक उड़ाऊँगा कयामत करूँँगा हिज्र की रात मेरी जान को आई हुई है बच गया तो मैं मोहब्बत की मज़म्मत करूँँगा अब तेरे राज़ सँभाले नहीं जाते मुझ सेे मैं किसी रोज़ अमानत में ख़यानत करूँँगा लयलातुल क़दर गुज़रेंगे किसी जंगल में नूर बरसेगा दरख़्तों की इमामत करूँँगा

Tehzeeb Hafi

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इक तिरा हिज्र दाइमी है मुझे वर्ना हर चीज़ आरज़ी है मुझे एक साया मिरे तआक़ुब में एक आवाज़ ढूँडती है मुझे मेरी आँखों पे दो मुक़द से हाथ ये अँधेरा भी रौशनी है मुझे मैं सुख़न में हूँ उस जगह कि जहाँ साँस लेना भी शा'इरी है मुझे इन परिंदों से बोलना सीखा पेड़ से ख़ामुशी मिली है मुझे मैं उसे कब का भूल-भाल चुका ज़िंदगी है कि रो रही है मुझे मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे

Tehzeeb Hafi

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ख़्वाबों को आँखों से मिन्हा करती है नींद हमेशा मुझ सेे धोखा करती है उस लड़की से बस अब इतना रिश्ता है मिल जाए तो बात वगैरा करती है आवाजों का हब्स अगर बढ़ जाता है ख़ामोशी मुझ में दरवाज़ा करती है बारिश मेरे रब की ऐसी नियमत है रोने में आसानी पैदा करती है सच पूछो तो हाफ़ी ये तन्हाई भी जीने का सामान मुहय्या करती है

Tehzeeb Hafi

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तेरी तरफ़ मेरा ख़याल क्या गया के फिर मैं तुझ को सोचता चला गया ये शहर बन रहा था मेरे सामने ये गीत मेरे सामने लिखा गया ये वस्ल सारी उम्र पर मुहीत है ये हिज्र एक रात में समा गया मुझे किसी की आस थी न प्यास थी ये फूल मुझ को भूल कर दिया गया बिछड़ के साँस खेंचना मुहाल था मैं ज़िंदगी से हाथ खेंचता गया मैं एक रोज़ दस्त क्या गया के फिर वो बाग़ मेरे हाथ से चला गया

Tehzeeb Hafi

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तू ने क्या क़िंदील जला दी शहज़ादी सुर्ख़ हुई जाती है वादी शहज़ादी शीश-महल को साफ़ किया तिरे कहने पर आइनों से गर्द हटा दी शहज़ादी अब तो ख़्वाब-कदे से बाहर पाँव रख लौट गए है सब फ़रियादी शहज़ादी तेरे ही कहने पर एक सिपाही ने अपने घर को आग लगा दी शहज़ादी मैं तेरे दुश्मन लश्कर का शहज़ादा कैसे मुमकिन है ये शादी शहज़ादी

Tehzeeb Hafi

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