तेरी तरफ़ मेरा ख़याल क्या गया के फिर मैं तुझ को सोचता चला गया ये शहर बन रहा था मेरे सामने ये गीत मेरे सामने लिखा गया ये वस्ल सारी उम्र पर मुहीत है ये हिज्र एक रात में समा गया मुझे किसी की आस थी न प्यास थी ये फूल मुझ को भूल कर दिया गया बिछड़ के साँस खेंचना मुहाल था मैं ज़िंदगी से हाथ खेंचता गया मैं एक रोज़ दस्त क्या गया के फिर वो बाग़ मेरे हाथ से चला गया
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
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क्या ख़बर उस रौशनी में और क्या रौशन हुआ जब वो इन हाथों से पहली मर्तबा रौशन हुआ वो मेरे सीने से लग कर जिस को रोई कौन था किस के बुझने पे मैं आज उस की जगह रौशन हुआ वैसे मैं इन रास्तों और ताख़चों का था नहीं फिर भी तू ने जिस जगह पर रख दिया रौशन हुआ मेरे जाने पर सभी रोए बहुत रोए मगर इक दिया मेरी तवक़्क़ो से सिवा रौशन हुआ तेरे अपने तेरी किरनों को तरसते है यहाँ तू ये किन गलियों में किन लोगों में जा रौशन हुआ मैं ने पूछा था कि मुझ जैसा भी कोई और है दूर जंगल में कहीं इक मकबरा रौशन हुआ जाने कैसी आग में वो जल रहा है इन दिनों उस ने मुँह पोंछा तो मेरा तौलिया रौशन हुआ कोई उस की रौशनी के शर से कब महफ़ूज़ है मेरी आँखें बुझ गई और कोयला रौशन हुआ
Tehzeeb Hafi
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अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मेरा वो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी न जाने कितने परिंदों ने इस में शिरकत की कल एक पेड़ की तरक़ीब-ए-रू-नुमाई थी हवाओं आओ मिरे गाँव की तरफ़ देखो जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी किसी सिपाह ने ख़े में लगा दिए हैं वहाँ जहाँ ये मैं ने निशानी तिरी दबाई थी गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी
Tehzeeb Hafi
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रात को दीप की लो कम नहीं रखी जाती धुंध में रौशनी मध्यम नहीं रखी जाती कैसे दरिया की हिफाजत तेरे जिम्में ठहराऊ तुझ से इक आँख अगर नम नहीं रखी जाती इस लिए छोड़कर जाने लगे सब चारागरा ज़ख़्म से इज्जते मरहम नहीं रखी जाति ऐसे कैसे मैं तुझे चाहने लग जाऊँ भला घर की बुनियाद तो यकदम नहीं रखी जाती
Tehzeeb Hafi
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मौसमों के तग़य्युर को भाँपा नहीं छतरियाँ खोल दीं ज़ख़्म भरने से पहले किसी ने मिरी पट्टियाँ खोल दीं हम मछेरों से पूछो समुंदर नहीं है ये इफ़रीत है तुम ने क्या सोच कर साहिलों से बँधी कश्तियाँ खोल दीं उस ने वा'दों के पर्बत से लटके हुओं को सहारा दिया उस की आवाज़ पर कोह-पैमाओं ने रस्सियाँ खोल दीं दश्त-ए-ग़ुर्बत में मैं और मिरा यार-ए-शब-ज़ाद बाहम मिले यार के पास जो कुछ भी था यार ने गठरियाँ खोल दीं कुछ बरस तो तिरी याद की रेल दिल से गुज़रती रही और फिर मैं ने थक हार के एक दिन पटरियाँ खोल दीं उस ने सहराओं की सैर करते हुए इक शजर के तले अपनी आँखों से ऐनक उतारी कि दो हिरनियाँ खोल दीं आज हम कर चुके अहद-ए-तर्क-ए-सुख़न पर रक़म दस्तख़त आज हम ने नए शाइ'रों के लिए भर्तियाँ खोल दीं
Tehzeeb Hafi
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