ghazalKuch Alfaaz

खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है लेकिन उस को फिर समझाया जा सकता है इस दुनिया में हम जैसे भी रह सकते हैं इस दलदल पर पाँव जमाया जा सकता है सब से पहले दिल के ख़ाली-पन को भरना पैसा सारी उम्र कमाया जा सकता है मैं ने कैसे कैसे सद में झेल लिए हैं इस का मतलब ज़हर पचाया जा सकता है इतना इत्मीनान है अब भी उन आँखों में एक बहाना और बनाया जा सकता है झूट में शक की कम गुंजाइश हो सकती है सच को जब चाहो झुठलाया जा सकता है

Related Ghazal

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

268 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

More from Shakeel Jamali

लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं इश्क़ में इतना ख़सारा है तो घर जाते हैं मौत को हम ने कभी कुछ नहीं समझा मगर आज अपने बच्चों की तरफ़ देख के डर जाते हैं ज़िंदगी ऐसे भी हालात बना देती है लोग साँसों का कफ़न ओढ़ के मर जाते हैं पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं क्या जुनूँ-ख़ेज़ मसाफ़त थी तिरे कूचे की और अब यूँँ है कि ख़ामोश गुज़र जाते हैं ये मोहब्बत की अलामत तो नहीं है कोई तेरा चेहरा नज़र आता है जिधर जाते हैं

Shakeel Jamali

5 likes

कोई बहाना कोई कहानी नहीं चलेगी मोहब्बतों में ग़लत-बयानी नहीं चलेगी मुनाफ़िक़ों पर वफ़ा का तमग़ा नहीं सजेगा ख़राब कपड़े पे कामदानी नहीं चलेगी हमें ये दुनिया ख़राब समझे ये उस की मर्ज़ी मगर सबूतों से छेड़खानी नहीं चलेगी बड़ों के नक्श-ए-क़दम पे बच्चे न चल सकेंगे पुरानी पटरी पे राजधानी नहीं चलेगी अगर वो अपनी ज़री की साड़ी पहन के निकली तो यार लोगों पे शेरवानी नहीं चलेगी वो महफ़िलें जो बग़ैर उजरत की खिदमतें हैं तो क्या वहाँ भी ग़ज़ल पुरानी नहीं चलेगी बहुत ज़ियादा भी मुत्मइन मत दिखाई देना बिछड़ते लम्हों में शादवानी नहीं चलेगी

Shakeel Jamali

10 likes

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं इक बीमार वसीयत करने वाला है रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं अभी न जाने कितना हँसना रोना है अभी तो हम सेे पहले वाले बैठे हैं साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं अंदर डोरी टूट रही है साँसों की बाहर बीमा करने वाले बैठे हैं

Shakeel Jamali

9 likes

अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए अब मिरे पास ख़ज़ाना है लुटाने के लिए ऐसी दफ़्'अ' न लगा जिस में ज़मानत मिल जाए मेरे किरदार को चुन अपने निशाने के लिए किन ज़मीनों पे उतारोगे अब इमदाद का क़हर कौन सा शहर उजाड़ोगे बसाने के लिए मैं ने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग अपने बच्चे के खिलौने को बचाने के लिए हो गई है मिरी उजड़ी हुई दुनिया आबाद मैं उसे ढूँढ़ रहा हूँ ये बताने के लिए नफ़रतें बेचने वालों की भी मजबूरी है माल तो चाहिए दूकान चलाने के लिए जी तो कहता है कि बिस्तर से न उतरूँ कई रोज़ घर में सामान तो हो बैठ के खाने के लिए

Shakeel Jamali

3 likes

सफ़र से लौट जाना चाहता है परिंदा आशियाना चाहता है कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया जो दो पैसे कमाना चाहता है यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं वो पागल ज़हर खाना चाहता है जिसे भी डूबना हो डूब जाए समुंदर सूख जाना चाहता है हमारा हक़ दबा रक्खा है जिस ने सुना है हज को जाना चाहता है

Shakeel Jamali

19 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Shakeel Jamali.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Shakeel Jamali's ghazal.