khatm ho jaaen na ye saari rivayat kahin shahr kha jaaen na saare hi mazafat kahin log sote hi nahin khvab bhala kya dekhen kyunki ab shahr men hoti hi nahin raat kahin diary sukhe hue phuul kitaben aansu ghar men rakkhi hain sabhi hijr ki saughhat kahin jhank kar dekh kabhi dil ke bhi angan men jahan muntazir ankhen to rakkhi hain shikayat kahin 'ain mumkin hai lage phir se koi zakhm naya yaar baithe hain lagae hue phir ghaat kahin chhod aaya tha tira shahr junun se pahle phir na le aaen vahin par mire halat kahin khatm ho jaen na ye sari riwayat kahin shahr kha jaen na sare hi mazafat kahin log sote hi nahin khwab bhala kya dekhen kyunki ab shahr mein hoti hi nahin raat kahin diary sukhe hue phul kitaben aansu ghar mein rakkhi hain sabhi hijr ki saughat kahin jhank kar dekh kabhi dil ke bhi aangan mein jahan muntazir aankhen to rakkhi hain shikayat kahin 'ain mumkin hai lage phir se koi zakhm naya yar baithe hain lagae hue phir ghat kahin chhod aaya tha tera shahr junun se pahle phir na le aaen wahin par mere haalat kahin
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शाह से छुपके क़ैदी ने शहज़ादी को पैगाम लिखा जंग से भागने वालों में शहज़ादे का भी नाम लिखा दूरदराज़ से आने वाले ख़त मेरी हम सेाही के थे इक दिन उस ने हिम्मत कर के अपना असली नाम लिखा हम दोनों ने अपने अपने दीन पे क़ाएम रहना था घर की इक दीवार पे अल्लाह इक दीवार पे राम लिखा एक मोहब्बत ख़त्म हुई तो दूसरी की तैयारी की नई कहानी के आगाज में पहली का अंजाम लिखा
Zia Mazkoor
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वो रूठी रूठी ये कह रही थी क़रीब आओ मुझे मनाओ हो मर्द तो आगे बढ़ के मुझ को गले लगाओ मुझे मनाओ मैं कल से नाराज़ हूँ क़सम से और एक कोने में जा पड़ी हूँ हाँ मैं ग़लत हूँ दिखाओ फिर भी तुम्हीं झुकाओ मुझे मनाओ तुम्हारे नख़रों से अपनी अन-बन तो बढ़ती जाएगी सुन रहे हो तुम एक सॉरी से ख़त्म कर सकते हो तनाव मुझे मनाओ तुम्हें पता भी है किस सखी से तुम्हारा पाला पड़ा हुआ है मुआ'फ़ कर दूँगी तुम को फ़ौरन ही आओ आओ मुझे मनाओ मुझे यूँँ अपने से दूर कर के न ख़ुश रहोगे ग़ुरूर कर के सो मुझ से कुछ फ़ासले पे रक्खो ये रख-रखाव मुझे मनाओ मुझे बताओ कि मेरी नाराज़गी से तुम को है फ़र्क़ कोई मैं खा रही हूँ न-जाने कब से ही पेच-ताव मुझे मनाओ मुझे पता है मुझे मनाने को तुम भी बेचैन हो रहे हो तो क्या ज़रूरी है तुम भी इतने भरम दिखाओ मुझे मनाओ मिरा इरादा तो पहले ही से है मान जाने का सच बताऊँ तुम अपने भर भी तमाम हर्बों को आज़माओ मुझे मनाओ बहुत बुरे हो मिरी दिखावे की नींद को भी तुम अस्ल समझे कहीं से सीखो पियार करना मुझे जगाओ मुझे मनाओ तुम अपने अंदाज़ में कि जैसे चढ़ा के रखते हो आस्तीनें तो मैं ''तुम्हारा'' रदीफ़ वाली ग़ज़ल सुनाओ मुझे मनाओ ख़िलाफ़-ए-मा'मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूँ कि फिर कभी मुझ से करते रहना ये भाव-ताव मुझे मनाओ मैं परले दर्जे का हट-धरम था कि फिर भी उस को मना न पाया सो अब भी कानों में गूँजता है मुझे मनाओ मुझे मनाओ
Amir Ameer
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तेरे आगे सर-कशी दिखलाउँगा? तू तो जो कह दे वही बन जाऊँगा ऐ ज़बूरी फूल ऐ नीले गुलाब मत ख़फ़ा हो मैं दोबारा आऊँगा सात सदियाँ सात रातें सात दिन इक पहेली है किसे समझाऊँगा यार हो जाए सही तुझ से मुझे तेरे क़ब्ज़े से तुझे छुड़वाऊंगा तुम बहुत मा'सूम लड़की हो तुम्हें नज़्म भेजूँगा दुआ पहनाऊँगा कोई दरिया है न जंगल और न बाग़ मैं यहाँ बिल्कुल नहीं रह पाऊँगा याद करवाउँगा तुझ को तेरे ज़ख़्म तेरी सारी ने'मतें गिनवाउँगा छोड़ना उस के लिए मुश्किल न हो मुझ से मत कहना मैं ये कर जाऊँगा मैं 'अली'-ज़र्यून हूँ काफ़ी है ये मैं ज़फ़र-इक़बाल क्यूँँ बन जाऊँगा
Ali Zaryoun
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इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने पहले यार बनाया फिर समझाया हम ने ख़ुद भी आख़िर-कार उन्हीं वा'दों से बहले जिन से सारी दुनिया को बहलाया हम ने भीड़ ने यूँँही रहबर मान लिया है वर्ना अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हम ने मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली ऐसा मरने का माहौल बनाया हम ने घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे तन्हाई को जगह जगह बिखराया हम ने इन लम्हों में किस की शिरकत कैसी शिरकत उसे बुला कर अपना काम बढ़ाया हम ने दुनिया के कच्चे रंगों का रोना रोया फिर दुनिया पर अपना रंग जमाया हम ने जब 'शारिक़' पहचान गए मंज़िल की हक़ीक़त फिर रस्ते को रस्ते भर उलझाया हम ने
Shariq Kaifi
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किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम फूल किस ने क़बूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम
Muzdum Khan
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