तेरे आगे सर-कशी दिखलाउँगा? तू तो जो कह दे वही बन जाऊँगा ऐ ज़बूरी फूल ऐ नीले गुलाब मत ख़फ़ा हो मैं दोबारा आऊँगा सात सदियाँ सात रातें सात दिन इक पहेली है किसे समझाऊँगा यार हो जाए सही तुझ से मुझे तेरे क़ब्ज़े से तुझे छुड़वाऊंगा तुम बहुत मा'सूम लड़की हो तुम्हें नज़्म भेजूँगा दुआ पहनाऊँगा कोई दरिया है न जंगल और न बाग़ मैं यहाँ बिल्कुल नहीं रह पाऊँगा याद करवाउँगा तुझ को तेरे ज़ख़्म तेरी सारी ने'मतें गिनवाउँगा छोड़ना उस के लिए मुश्किल न हो मुझ से मत कहना मैं ये कर जाऊँगा मैं 'अली'-ज़र्यून हूँ काफ़ी है ये मैं ज़फ़र-इक़बाल क्यूँँ बन जाऊँगा
Related Ghazal
ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
59 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
81 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
More from Ali Zaryoun
हालत ए हिज्र में हूँ यार मेरी सम्त न देख तू न हो जाए गिरफ्तार, मेरी सम्त न देख आस्तीन में जो छूपे सांप हैं उन को तो निकाल अपने नुक़सान पर हर बार मेरी सम्त न देख तुझ को जिस बात का 'ख़द्शा' है वो हो सकती है ऐसे नश्शे में लगातार मेरी सम्त न देख या कोई बात सुना या मुझे सीने से लगा इस तरह बैठ कर बेकार मेरी सम्त न देख तेरा यारों से नहीं जेब से याराना है ऐ मोहब्बत के दुकाँदार मेरी सम्त न देख
Ali Zaryoun
7 likes
तूर-ए-सीना है सर करोगे मियाँ अपने अंदर सफ़र करोगे मियाँ तुम हमें रोज़ याद करते हो फिर तो तुम उम्र भर करोगे मियाँ वो जो इक लफ्ज़ मर गया है उस को किस की ख़बर करोगे मियाँ और दिल-ए-दरवेश एक मदीना है तुम मदीने में सैर करोगे मियाँ
Ali Zaryoun
6 likes
अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं ख़ुद अपने साथ हूँ या'नी ख़ुदा के साथ हूँ मैं मुजावरान-ए-हवस तंग हैं कि यूँँ कैसे बग़ैर शर्म-ओ-हया भी हया के साथ हूँ मैं सफ़र शुरूअ' तो होने दे अपने साथ मिरा तू ख़ुद कहेगा ये कैसी बला के साथ हूँ मैं मैं छू गया तो तिरा रंग काट डालूँगा सो अपने आप से तुझ को बचा के साथ हूँ मैं दुरूद-बर-दिल-ए-वहशी सलाम-बर-तप-ए-इश्क़ ख़ुद अपनी हम्द ख़ुद अपनी सना के साथ हूँ मैं यही तो फ़र्क़ है मेरे और उन के हल के बीच शिकायतें हैं उन्हें और रज़ा के साथ हूँ मैं मैं अव्वलीन की इज़्ज़त में आख़िरीन का नूर वो इंतिहा हूँ कि हर इब्तिदा के साथ हूँ मैं दिखाई दूँ भी तो कैसे सुनाई दूँ भी तो क्यूँँ वरा-ए-नक़्श-ओ-नवा हूँ फ़ना के साथ हूँ मैं ब-हुक्म-ए-यार लवें कब्ज़ करने आती है बुझा रही है? बुझाए हवा के साथ हूँ मैं ये साबिरीन-ए-मोहब्बत ये काशिफ़ीन-ए-जुनूँ इन्ही के संग इन्हीं औलिया के साथ हूँ मैं किसी के साथ नहीं हूँ मगर जमाल-ए-इलाहा तिरी क़िस्म तिरे हर मुब्तला के साथ हूँ मैं ज़माने भर को पता है मैं किस तरीक़ पे हूँ सभी को इल्म है किस दिल-रुबा के साथ हूँ मैं मुनाफ़िक़ीन-ए-तसव्वुफ़ की मौत हूँ मैं 'अली' हर इक असील हर इक बे-रिया के साथ हूँ मैं
Ali Zaryoun
5 likes
चरागाहें नई आबाद होगी मगर जो बस्तियाँ बर्बाद होगी ख़ुदा मिट्टी को फिर से हुक्म देगा कई शक्लें नई ईजाद होगी अभी मुमकिन नहीं लेकिन ये होगा किताबें साहिब-ए-औलाद होगी मैं उन आँखों को पढ़ कर सोचता हूँ ये नज्में किस तरह से याद होगी ये परियाँ फिर नहीं आएगी मिलने ये ग़ज़लें फिर नहीं इरशाद होगी मैं डरता हूँ अली उन आदतों से के जो मुझ को तुम्हारे बा'द होगी
Ali Zaryoun
21 likes
पराई नींद में सोने का तजरबा कर के मैं ख़ुश नहीं हूँ तुझे ख़ुद में मुब्तला कर के उसूली तौर पे मर जाना चाहिए था मगर मुझे सुकून मिला है तुझे जुदा कर के ये क्यूँँ कहा कि तुझे मुझ से प्यार हो जाए तड़प उठा हूँ तिरे हक़ में बद-दुआ' कर के मैं चाहता हूँ ख़रीदार पर ये खुल जाए नया नहीं हूँ रखा हूँ यहाँ नया कर के मैं जूतियों में भी बैठा हूँ पूरे मान के साथ किसी ने मुझ को बुलाया है इल्तिजा कर के बशर समझ के किया था ना यूँँ नज़र-अंदाज़ ले मैं भी छोड़ रहा हूँ तुझे ख़ुदा कर के तो फिर वो रोते हुए मिन्नतें भी मानते हैं जो इंतिहा नहीं करते हैं इब्तिदा कर के बदल चुका है मिरा लम्स नफ़सियात उस की कि रख दिया है उसे मैं ने अन-छुआ कर के मना भी लूँगा गले भी लगाऊँगा मैं 'अली' अभी तो देख रहा हूँ उसे ख़फ़ा कर के
Ali Zaryoun
14 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ali Zaryoun.
Similar Moods
More moods that pair well with Ali Zaryoun's ghazal.







