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तूर-ए-सीना है सर करोगे मियाँ अपने अंदर सफ़र करोगे मियाँ तुम हमें रोज़ याद करते हो फिर तो तुम उम्र भर करोगे मियाँ वो जो इक लफ्ज़ मर गया है उस को किस की ख़बर करोगे मियाँ और दिल-ए-दरवेश एक मदीना है तुम मदीने में सैर करोगे मियाँ

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं ख़ुद अपने साथ हूँ या'नी ख़ुदा के साथ हूँ मैं मुजावरान-ए-हवस तंग हैं कि यूँँ कैसे बग़ैर शर्म-ओ-हया भी हया के साथ हूँ मैं सफ़र शुरूअ' तो होने दे अपने साथ मिरा तू ख़ुद कहेगा ये कैसी बला के साथ हूँ मैं मैं छू गया तो तिरा रंग काट डालूँगा सो अपने आप से तुझ को बचा के साथ हूँ मैं दुरूद-बर-दिल-ए-वहशी सलाम-बर-तप-ए-इश्क़ ख़ुद अपनी हम्द ख़ुद अपनी सना के साथ हूँ मैं यही तो फ़र्क़ है मेरे और उन के हल के बीच शिकायतें हैं उन्हें और रज़ा के साथ हूँ मैं मैं अव्वलीन की इज़्ज़त में आख़िरीन का नूर वो इंतिहा हूँ कि हर इब्तिदा के साथ हूँ मैं दिखाई दूँ भी तो कैसे सुनाई दूँ भी तो क्यूँँ वरा-ए-नक़्श-ओ-नवा हूँ फ़ना के साथ हूँ मैं ब-हुक्म-ए-यार लवें कब्ज़ करने आती है बुझा रही है? बुझाए हवा के साथ हूँ मैं ये साबिरीन-ए-मोहब्बत ये काशिफ़ीन-ए-जुनूँ इन्ही के संग इन्हीं औलिया के साथ हूँ मैं किसी के साथ नहीं हूँ मगर जमाल-ए-इलाहा तिरी क़िस्म तिरे हर मुब्तला के साथ हूँ मैं ज़माने भर को पता है मैं किस तरीक़ पे हूँ सभी को इल्म है किस दिल-रुबा के साथ हूँ मैं मुनाफ़िक़ीन-ए-तसव्वुफ़ की मौत हूँ मैं 'अली' हर इक असील हर इक बे-रिया के साथ हूँ मैं

Ali Zaryoun

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वो ही कर्तबा तेरी याद का, वो ही नै नवा ए ख़याल है वो ही मैं जो था तेरे हिज्र में, वो ही मशहद ए ख़द-ओ-ख़ाल है तेरी नींद किस के लिए उड़ी, मेरा ख़्वाब किस ने बुझा दिया इसे सुन कर रूख़ नहीं फेरना, तेरे मातमी का सवाल है ये मजाक़ तो नहीं हो रहा, मैं ख़ुशी से तो नहीं रो रहा कोई फिल्म तो नहीं चल रही, मेरी जान ये मेरा हाल है किसी सैय्यदा के चरण पडूं, कोई काज़मी जो दुआ करे कोई हो जो ग़म की हया करे, मेरा कर्बलाई मलाल है वो चराग़ ए शहर ए विफाक़ है, मेरे साथ जिस का फिराक़ है भले दूर पार से ही सही, मेरा राब़्ता तो बहाल है वो ख़ुशी से इतनी निहाल थी कि "अली" मैं सोच कर डर गया मैं उसे बता ही नहीं सका कि ये मेरी आख़िरी कॉल है

Ali Zaryoun

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सुकूत-ए-शाम का हिस्सा तू मत बना मुझ को मैं रंग हूँ सो किसी मौज में मिला मुझ को मैं इन दिनों तिरी आँखों के इख़्तियार में हूँ जमाल-ए-सब्ज़ किसी तजरबे में ला मुझ को मैं बूढे जिस्म की ज़िल्लत उठा नहीं सकता किसी क़दीम तजल्ली से कर नया मुझ को मैं अपने होने की तकमील चाहता हूँ सखी सो अब बदन की हिरासत से कर रिहा मुझ को मुझे चराग़ की हैरत भी हो चुकी मालूम अब इस से आगे कोई रास्ता बता मुझ को उस इस्म-ए-ख़ास की तरकीब से बना हूँ मैं मोहब्बतों के तलफ़्फ़ुज़ से कर नया मुझ को दरून-ए-सीना जिसे दिल समझ रहा था 'अली' वो नीली आग है ये अब पता चला मुझ को

Ali Zaryoun

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हालत ए हिज्र में हूँ यार मेरी सम्त न देख तू न हो जाए गिरफ्तार, मेरी सम्त न देख आस्तीन में जो छूपे सांप हैं उन को तो निकाल अपने नुक़सान पर हर बार मेरी सम्त न देख तुझ को जिस बात का 'ख़द्शा' है वो हो सकती है ऐसे नश्शे में लगातार मेरी सम्त न देख या कोई बात सुना या मुझे सीने से लगा इस तरह बैठ कर बेकार मेरी सम्त न देख तेरा यारों से नहीं जेब से याराना है ऐ मोहब्बत के दुकाँदार मेरी सम्त न देख

Ali Zaryoun

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इसी लिए तो मुझे सुनके तैश आया है तुम्हारा हाल किसी और ने बताया है मुझे बता मेरा भाई शहीद कैसे हुआ तू उस के साथ था तू कैसे बच के आया है अभी ये ज़ख़्म किसी पर नहीं खुला मेरा अभी ये शे'र किसी को नहीं सुनाया है

Ali Zaryoun

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