किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम फूल किस ने क़बूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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वो जो मेरी ताबकारी में पिघलने लग गया जो सितारा भी नहीं था वो भी जलने लग गया ख़ूब-सूरत औरतों ने कर दी बीनाई अता आँख मलने वाला आख़िर हाथ मलने लग गया दूसरा पाँव नहीं रखने दिया मैं ने उसे पहला पाँव रखते ही चश्मा उबलने लग गया
Muzdum Khan
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मुझे न माँगती तो बोलती ख़ुदा दो मुझे बचा लिया है गुनाह से तुम्हें दुआ दो मुझे ये लोग देख रहें हैं मेरी चमक में तुम्हें कहीं अकेले जलाना अभी बुझा दो मुझे मुझे किसी से मुहब्बत नहीं तुम्हारे सिवा तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो बता दो मुझे
Muzdum Khan
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हमारा दिल जब नहीं लगा तो सवाल पैदा हुआ लगेगा जवाब में हमनें कह दिया ठीक है मगर और क्या लगेगा अ गर कभी तीर चूम कर वो मेरी तरफ़ छोड़ दे कमां से मेरा मुक़द्दर तो इस तरह का है तीर दुश्मन को जा लगेगा कि दोस्त ऐसे मुआशरे में मुआशका चाहते हैं मुझ सेे मैं जिस में थप्पड़ भी खाना चाहूँ तो वो भी बुर्के में आ लगेगा हमारा नक़्शा किराया मेहनत दिमाग लगता है रास्तों पर तुम्हारी तो इनसे दोस्ती है तुम्हारा तो शुक्रिया लगेगा मुशायरों में ग़ज़ल नहीं लोग सिर्फ़ हुलियों को देखते हैं मेरा भी एक दोस्त है जो हँसने के बा'द जॉन एलिया लगेगा
Muzdum Khan
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तेरी तस्वीर मोअत्तल नहीं होती मेरे दोस्त वरना दीवार तो पागल नहीं होती मेरे दोस्त इश्क़ में जीत मुक़द्दर से है मेहनत से नहीं ऐसे खेलों में रिहर्सल नहीं होती मेरे दोस्त उस ने बेचैनी भी बख़्शी है बड़ी मुश्किल से और बेचैनी मुसलसल नहीं होती मेरे दोस्त
Muzdum Khan
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दुनिया मेरे ख़िलाफ़ थी, तू भी ख़िलाफ़ है ये सच नहीं है ,है तो मुझे इख़्तिलाफ़ है जो भी करे जहाँ भी करे जिस तरह करे उस को मेरी तरफ़ से सभी कुछ मुआ'फ़ है भीगे हुए है दामन-ओ-रूमाल-ओ-आस्तीं हालांकि आसमान पे मतला भी साफ़ है आवाज़ ही सुनी न हो जिस शख़्स ने कभी उस के लिए मैं जो भी कहूँ इंकिशाफ़ है बदनाम हो गया हूँ मोहब्बत में नाम पर 'मुज़दम' ये मेरा सब सेे बड़ा एतिराफ़ है
Muzdum Khan
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